श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरय: ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
ॐ—हे प्रभु; नम:—नमस्कार है; भगवते—भगवान् को; वासुदेवाय—वासुदेव (वसुदेव-पुत्र) या आदि भगवान् श्रीकृष्ण को; जन्म-आदि—उत्पत्ति, पालन तथा संहार; अस्य—प्रकट ब्रह्माण्डों का; यत:—जिनसे; अन्वयात्—प्रत्यक्ष रूप से; इतरत:—अप्रत्यक्ष रूप से; च—तथा; अर्थेषु—उद्देश्यों में; अभिज्ञ:—पूर्ण रूप से अवगत; स्व-राट्—पूर्णरूप से स्वतन्त्र; तेने—प्रदान किया; ब्रह्म—वैदिक ज्ञान; हृदा—हृदय की चेतना; य:—जो; आदि-कवये—प्रथम सर्जित जीव के लिए; मुह्यन्ति—मोहित होते हैं; यत्—जिनके विषय में; सूरय:—बड़े-बड़े मुनि तथा देवता; तेज:—अग्नि; वारि—जल; मृदाम्—पृथ्वी; यथा—जिस प्रकार; विनिमय:—क्रिया-प्रतिक्रिया; यत्र—जहाँ पर; त्रि-सर्ग:—सृष्टि के तीन गुण, सृष्टिकारी शक्तियाँ; अमृषा—सत्यवत्; धाम्ना—समस्त दिव्य सामग्री के साथ; स्वेन—अपने से; सदा—सदैव; निरस्त— अनुपस्थिति के कारण त्यक्त; कुहकम्—मोह को; सत्यम्—सत्य को; परम्—परम; धीमहि—मैं ध्यान करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, हे वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ। मैं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं और व्यक्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वे प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से सारे जगत से अवगत रहते हैं और वे परम स्वतंत्र हैं, क्योंकि उनसे परे अन्य कोई कारण है ही नहीं। उन्होंने ही सर्वप्रथम आदि जीव ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया। उन्हीं के कारण बड़े-बड़े मुनि तथा देवता उसी तरह मोह में पड़ जाते हैं, जिस प्रकार अग्नि में जल या जल में स्थल देखकर कोई माया के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है। उन्हीं के कारण ये सारे भौतिक ब्रह्माण्ड, जो प्रकृति के तीन गुणों की प्रतिक्रिया के कारण अस्थायी रूप से प्रकट होते हैं, वास्तविक लगते हैं जबकि ये अवास्तविक होते हैं। अत: मैं उन भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो भौतिक जगत के भ्रामक रूपों से सर्वथा मुक्त अपने दिव्य धाम में निरन्तर वास करते हैं। मैं उनका ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे ही परम सत्य हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् वासुदेव को नमस्कार करना प्रत्यक्ष रूप से वसुदेव तथा देवकी के दिव्य पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण को इंगित करता है। इस तथ्य की अधिकाधिक व्याख्या इस ग्रंथ में सुस्पष्ट रूप से की जाएगी। यहाँ पर श्री व्यासदेव दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि श्रीकृष्ण ही आदि भगवान् हैं और अन्य सभी रूप उनके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पूर्ण अंश या अंशांश हैं। श्रील जीव गोस्वामी ने अपनी कृती कृष्ण-सन्दर्भ में इस विषय की विशद व्याख्या की है और आदि जीव ब्रह्मा ने अपने ग्रन्थ ब्रह्म-संहिता में श्रीकृष्ण विषयक यथेष्ठ व्याख्या की है। सामवेद उपनिषद् में भी बताया गया है कि भगवान् श्रीकृष्ण देवकी के दिव्य पुत्र हैं। इसीलिए इस स्तुति का यह पहला कथन बताता है कि भगवान् श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं। यदि परम भगवान् किसी दिव्य नाम से जाने जा सकते हैं, तो वह कृष्ण शब्द ही होना चाहिए जिसका अर्थ है सर्वाकर्षक। भगवद्गीता में भगवान् ने कई स्थलों पर स्वयं को आदि भगवान् घोषित किया है और इसकी पुष्टि अर्जुन के द्वारा तथा नारद, व्यास आदि बड़े-बड़े मुनियों द्वारा भी की गई है। पद्म पुराण में यह भी कहा गया है कि भगवान् के असंख्य नामों में से कृष्ण नाम सर्वप्रमुख है। वासुदेव नाम भगवान् के पूर्ण अंश का सूचक है और भगवान् के अन्य सभी रूप, जो वासुदेव से अभिन्न हैं, इस ग्रन्थ में बताये गये हैं। वासुदेव नाम विशिष्ट रूप से वसुदेव तथा देवकी के दिव्य पुत्र का सूचक है। संन्यासियों में सिद्ध परमहंसों द्वारा श्रीकृष्ण का ध्यान सदा ही किया जाता है।
वासुदेव अथवा भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त कारणों के कारण हैं। जितनी भी वस्तुओं का अस्तित्व है, वे सभी भगवान् से ही उद्भूत हैं। ऐसा किस तरह है, इसकी व्याख्या इस ग्रंथ के अगले अध्यायों में की गई है। महाप्रभु श्री चैतन्य ने इस ग्रन्थ को निर्मल पुराण कहा है, क्योंकि इसमें भगवान् श्रीकृष्ण का दिव्य आख्यान है। श्रीमद्भागवत का इतिहास भी अत्यन्त महिमा-मय है। इसका संकलन श्री व्यासदेव ने दिव्य ज्ञान में परिपक्वता प्राप्त करने के पश्चात् किया। उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु श्री नारदजी के अनुदेशों के अंतर्गत इसकी रचना की। व्यासदेव ने समस्त वैदिक वाङ्मय का संकलन किया जिसमें चारों वेद, वेदान्त सूत्र (या ब्रह्म सूत्र), पुराण, महाभारत इत्यादि सम्मिलित हैं। किन्तु वे इतने पर भी संतुष्ट नहीं हुए। जब उनके गुरु नारद ने उनके इस असंतोष को देखा, तो उन्होंने उनको भगवान् कृष्ण के दिव्य कार्यकलापों के विषय में लिखने का उपदेश दिया। ये दिव्य कार्यकलाप इस ग्रन्थ के दशम स्कंध में विशेष रूप से वर्णित हैं। किन्तु इसका सार-तत्व प्राप्त करने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह धीरे-धीरे ज्ञान विकसित करके क्रमश: आगे बढ़े।

यह स्वाभाविक है कि चिन्तनशील मनुष्य सृष्टि का उद्गम जानना चाहता है। रात्रि में वह आकाश में तारों को देखता है और स्वाभाविक है कि वह उनके निवासियों के विषय में कल्पनाएँ करता है। ऐसी जिज्ञासा मनुष्य के लिए स्वाभाविक है, क्योंकि उसकी चेतना विकसित है, जो पशुओं की तुलना में उच्च है। श्रीमद्भागवतम् के रचयिता ऐसी जिज्ञासाओं का सीधा उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त सृष्टियों के उद्गम हैं। वे न केवल ब्रह्माण्ड के स्रष्टा हैं, वरन् उसके संहर्ता भी हैं। इस दृश्य जगत की उत्पत्ति भगवान् की इच्छा से किसी काल में होती है, कुछ काल तक इसका परि-पालन होता है और तब उनकी ही इच्छा से इसका संहार हो जाता है। अतएव समस्त जागतिक कार्यों के पीछे उनकी परम इच्छा रहती है। निस्सन्देह, ऐसे अनेक नास्तिक हैं जो स्रष्टा पर विश्वास नहीं करते, किन्तु वे अल्पज्ञान के कारण ऐसा करते हैं। उदाहरणार्थ, आधुनिक विज्ञानी ने अन्तरिक्ष उपग्रह बनाये हैं, जिन्हें किसी-न-किसी युक्ति से बाह्य आकाश में प्रक्षिप्त किया जाता है और दूर बैठे विज्ञानी के निर्देश से ये कुछ काल तक आकाश में उड़ते रहते हैं। इसी प्रकार असंख्य तारों तथा ग्रहों से युक्त सारे ब्रह्माण्ड भगवान् की बुद्धि द्वारा नियन्त्रित होते हैं।

वैदिक साहित्य में यह कहा गया है कि परम सत्य, पुरुषोत्तम भगवान् समस्त पुरुषों में प्रधान हैं। प्रथम सृजित जीव ब्रह्मा से लेकर एक छोटी-से-छोटी चींटी तक सारे जीव ही जीव हैं। ब्रह्मा से ऊपर भी अपनी अपनी क्षमताओं वाले अन्य व्यक्तित्व हैं और भगवान् भी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। जिस तरह अन्य जीव व्यक्ति हैं, उसी तरह भगवान् भी एक व्यक्ति हैं। किन्तु परमेश्वर या परम पुरुष में उत्कृष्टतम बुद्धि होती है और उनमें विभिन्न प्रकार की श्रेष्ठतम अचिन्त्य शक्तियाँ होती हैं। यदि मनुष्य का मस्तिष्क अन्तरिक्ष-उपग्रह बना सकता है, तब तो कोई भी बहुत आसानी से कल्पना कर सकता है कि मनुष्य से उच्चत्तर कोटि का मस्तिष्क ऐसी आश्चर्यजनक वस्तुएँ बना सकता है जो कहीं अधिक श्रेष्ठ हों। विचारवान व्यक्ति इस तर्क को आसानी से स्वीकार कर लेगा, किन्तु कुछ ऐसे कट्टर नास्तिक होते हैं, जो इससे कभी सहमत नहीं होंगे। श्रील व्यासदेव परम बुद्धिमान को परमेश्वर रूप में पूरी तरह स्वीकार करते हैं और इस परम बुद्धिमान को पर, परमेश्वर या पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में सम्बोधित करते हुए नमस्कार करते हैं। यह परमेश्वर श्रीकृष्ण ही हैं जैसाकि व्यासदेव ने भगवद्गीता में तथा अपने अन्य शास्त्रों में और विशेष रूप से श्रीमद्भागवत में स्वीकार किया है। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि उनसे बढक़र कोई परतत्त्व या अन्तिम लक्ष्य नहीं है। इसीलिए श्री व्यासदेव तुरन्त उन परतत्त्व श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं जिनकी दिव्य लीलाओं का वर्णन दशम स्कंध में हुआ है।

निष्ठाहीन व्यक्ति सीधे दशम स्कंध में और विशेषकर उन पाँच अध्यायों में पहुँच जाते हैं, जिनमें भगवान् की रासलीला का वर्णन है। श्रीमद्भागवत का यह अंश इस महान ग्रन्थ का गुह्यतम अंश है। जब तक किसी को भगवान् का पूरा-पूरा दिव्य ज्ञान प्राप्त न हो ले, तब तक वह भगवान् की पूज्य दिव्य लीलाओं को, जिन्हें रास-नृत्य कहा जाता है, तथा गोपियों के साथ उनके प्रेम व्यवहार को ठीक से समझ नहीं सकता। यह विषय अत्यन्त आध्यात्मिक है। केवल ऐसे मुक्त पुरुष, जिन्होंने क्रमश: परमहंस अवस्था प्राप्त कर ली है, इस रास-नृत्य का दिव्य आस्वादन कर सकते हैं। अत: श्रील व्यासदेव पाठक को अवसर प्रदान करते हैं कि भगवान् की लीलाओं के सार का आस्वादन करने के पूर्व वे धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार का विकास करें। इसीलिए वे जान बूझकर गायत्री मन्त्र धीमहि का आवाहन करते हैं। यह गायत्री मन्त्र अध्यात्म में बढ़े-चढ़े व्यक्तियों के निमित्त है। जब कोई गायत्री मन्त्र का उच्चारण करने में सफल हो जाता है, तब वह भगवान् की दिव्य स्थिति तक प्रवेश पा सकता है। अत: गायत्री मन्त्र के सफल जप के लिए मनुष्य में ब्राह्मण जैसे गुणों का समावेश होना चाहिए या फिर उसे पूर्ण रूप से सतोगुणी होना चाहिए। तभी वह भगवान् के नाम, यश, गुणों आदि की दिव्य अनुभूति प्राप्त कर सकता है। श्रीमद्भागवत भगवान् की अन्तरंगा शक्ति द्वारा प्रदर्शित उनके स्वरूप का आख्यान है और यह अन्तरंगा शक्ति हमारे अनुभवगम्य दृश्य जगत को उत्पन्न करने वाली बहिरंगा शक्ति से भिन्न होती है। श्रील व्यासदेव ने इस श्लोक में इन दोनों शक्तियों में अन्तर स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि प्रकट अन्तरंगा शक्ति वास्तविक है, जब कि भौतिक जगत के रूप में प्रकट होने वाली बहिरंगा शक्ति अनित्य है और मृग-मरीचिका जैसी है। मृग-मरीचिका में वास्तविक जल नहीं रहता, केवल जल का आभास रहता है। वास्तविक जल तो कहीं अन्यत्र रहता है। यह दृश्य जगत एक वास्तविकता जैसा प्रतीत होता है, किन्तु वास्तविकता तो आध्यात्मिक जगत में होती है और यह तो उसकी छाया (प्रतिबिम्ब) मात्र है। परम सत्य तो वैकुण्ठलोक (चिदाकाश) में हैं, भौतिक आकाश में नहीं। भौतिक आकाश में प्रत्येक वस्तु सापेक्ष सत्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि एक सत्य किसी अन्य पर आश्रित होता है। यह दृश्य जगत प्रकृति के तीनों गुणों की अन्त:क्रिया से बनता है और यह अनित्य जगत बद्धजीव के मोहग्रस्त मन को वास्तविकता का भ्रम प्रस्तुत करने वाला होता है। बद्धजीव अनेकानेक योनियों में प्रकट होते हैं जिनमें ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्र जैसे उच्चतर देवता भी सम्मिलित हैं। यथार्थ में प्रकट जगत में कोई वास्तविकता नहीं है। किन्तु यह वास्तविक जैसा प्रतीत होता है। वास्तविकता का अस्तित्व तो वैकुण्ठलोक में है, जहाँ पुरुषोत्तम भगवान् अपनी दिव्य सामग्री के साथ नित्य विद्यमान रहते हैं।

किसी जटिल निर्माण कार्य का मुख्य इंजीनियर निर्माण-कार्य में स्वयं भाग नहीं लेता, किन्तु वह इसके कोने-कोने से परिचित रहता है, क्योंकि सारा कार्य उसी के निर्देशन में सम्पन्न होता है। वह प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से निर्माण-कार्य के विषय में हर बात जानता है। इसी प्रकार, भगवान् भी इस दृश्य जगत के सर्वोपरि अभियन्ता होने के कारण इसके कोने-कोने से परिचित हैं, यद्यपि सारे कार्य देवताओं द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। इस भौतिक सृष्टि में ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक कोई भी स्वतंत्र नहीं है। हर स्थान पर भगवान् का हाथ देखने में आता है। सभी भौतिक तत्त्वों के साथ-साथ आध्यात्मिक स्फुलिंगो का उद्भव उन्हीं से होता है। इस भौतिक जगत में और जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह भौतिक तथा आध्यात्मिक (अपरा तथा परा) शक्तियों की ही अन्त:क्रियाओं से होता है, जो परम सत्य भगवान् श्रीकृष्ण से उद्भूत होती हैं। एक रसायन-शास्त्री अपनी प्रयोगशाला में बैठे-बैठे हाइड्रोजन तथा आक्सीजन मिलाकर जल उत्पन्न कर सकता है। किन्तु वास्तव में जीव तो परमेश्वर के निर्देशानुसार प्रयोगशाला में कार्य करता है और वह रसायनवेत्ता जिन सामग्रियों से कार्य सम्पन्न करता है, वे भगवान् द्वारा प्रदान की गई हैं। भगवान् प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक वस्तु को जानते हैं तथा वे सभी सूक्ष्म बातों को जानने वाले हैं तथा सम्पूर्ण स्वतन्त्र हैं। उनकी तुलना सोने की खान से की जा सकती है, जबकि विभिन्न रूपों वाले दृश्य जगत की तुलना सोने से बनी विविध वस्तुओं से की जा सकती है, जैसे सोने की अँगूठी, हार इत्यादि। सोने की अँगूठी तथा सोने के हार के गुण खान में पाये जाने वाले सोने के ही समान होते हैं, किन्तु खान का सोना परिमाण में भिन्न है। अत: परम सत्य एक ही है और साथ ही साथ भिन्न भी है। परम सत्य के तुल्य पूरी तरह से कुछ भी नहीं है, किन्तु साथ ही, परम सत्य से स्वतन्त्र भी कुछ नहीं है।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के शिल्पी ब्रह्मा से लेकर एक नगण्य चींटी तक सारे बद्धजीव सृजन का कार्य करते हैं, किन्तु इनमें से कोई भी परमेश्वर से स्वतन्त्र नहीं है। भौतिकतावादी व्यक्ति व्यर्थ ही सोचता है कि उसके अतिरिक्त कोई अन्य स्रष्टा नहीं है। यह माया या भ्रम कहलाता है। अल्पज्ञान के कारण भौतिकतावादी अपनी अपूर्ण इन्द्रियों के परे देख नहीं पाता और इस प्रकार से वह सोचता है कि पदार्थ, किसी श्रेष्ठ बुद्धि के बिना ही, स्वत: आकार ग्रहण करता है। किन्तु श्रील व्यासदेव ने इस श्लोक में इसका खंडन किया है, “चूँकि परम पूर्ण या परम सत्य प्रत्येक वस्तु के उद्गम हैं, अत: परम सत्य के शरीर से स्वतन्त्र कोई भी वस्तु नहीं हो सकती है।” देह के साथ जो कुछ घटित होता है, वह देही को तुरन्त ज्ञात हो जाता है। इसी प्रकार यह सृष्टि उस परम पूर्ण का शरीर है, अत: इस सृष्टि में जो कुछ घटित होता है उसे वे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जानते हैं।

श्रुति मन्त्र में यह भी कहा गया है कि परम पूर्ण या ब्रह्म समस्त वस्तुओं का चरम उद्गम हैं। प्रत्येक वस्तु उन्हीं से उद्भूत है, उन्हीं के द्वारा पालित है और अन्त में उन्हीं में प्रवेश कर जाती है। यही प्रकृति का नियम है। स्मृति मन्त्र में इसी की पुष्टि की गई है। यह कहा गया है कि ब्रह्मा के कल्प के प्रारम्भ में जिस उद्गम से सारी वस्तुएँ उद्भूत होती हैं और अन्तत: जिस आगार में वे प्रवेश करती हैं, वह परम सत्य या ब्रह्म है। भौतिक विज्ञानी यह मानकर चलते हैं कि ग्रह मंडल का उद्गम सूर्य है, किन्तु वे सूर्य का उद्गम नहीं बता पाते। यहाँ पर इस चरम उद्गम की व्याख्या की गई है। वैदिक वाङ्मय के अनुसार ब्रह्मा, जो सूर्य के तुल्य माने जा सकते हैं, परम स्रष्टा नहीं हैं। इस श्लोक में कहा गया है कि ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान भगवान् के द्वारा प्रदान किया गया। कोई चाहे तो यह तर्क कर सकता है कि प्रथम जीव होने के नाते, ब्रह्मा को प्रेरित नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस समय कोई दूसरा व्यक्ति जिवित न था। यहाँ पर यह कहा गया है कि परमेश्वर ने गौण स्रष्टा ब्रह्मा को प्रेरित किया जिससे वे सृजन कार्य कर सकें। अत: समस्त सृष्टि के पीछे जो परम बुद्धि कार्य करती है, वह परब्रह्म श्रीकृष्ण हैं। भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही पदार्थ की समग्रता को गठित करने वाली सर्जक शक्ति यानी प्रकृति का निरीक्षण करते हैं। अतएव श्री व्यासदेव ब्रह्मा की नहीं, अपितु परमेश्वर की पूजा करते हैं जो सृष्टि-कार्यों में ब्रह्मा का मार्गदर्शन करने वाले हैं। इस श्लोक में अभिज्ञ: तथा स्वराट् शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। ये दो शब्द परमेश्वर और अन्य सभी जीवों में अन्तर बताते हैं। दूसरा कोई भी जीव अभिज्ञ: अथवा स्वराट् नहीं है, अर्थात् कोई भी जीव न तो पूरी तरह जानता है, न ही पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। यहाँ तक कि सृष्टि करने के लिए ब्रह्मा को भी परमेश्वर का ध्यान करना होता है। तो फिर आइन्स्टाइन जैसे महान विज्ञानियों के विषय में क्या कहा जा सकता है? ऐसे विज्ञानियों का मस्तिष्क निश्चित रूप से किसी मनुष्य की उपज नहीं है। जब कोई विज्ञानी ऐसा मस्तिष्क नहीं बना सकता, तो फिर उन मूर्ख नास्तिकों का क्या कहना जो भगवान् की सत्ता को चुनौती देते हैं? यहाँ तक कि मायावादी निर्विशेषवादी जो अपने को भगवान् से एकाकार होने की डींग मारते रहते हैं, न तो अभिज्ञ: हैं, न स्वराट्। ऐसे निर्विशेषवादी भगवान् का तादात्म्य प्राप्त करने के लिए ज्ञानार्जन हेतु कठिन तपस्या करते हैं। किन्तु अन्तत: वे किसी ऐसे धनी शिष्य पर आश्रित हो जाते हैं, जो मठ तथा मन्दिर बनवाने के लिए उन्हें धन प्रदान करता है। रावण या हिरण्यकशिपु जैसे नास्तिकों को भगवान् की सत्ता का विरोध करने के पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ी थी, किन्तु अन्त में वे असहाय बन गये और जब भगवान् क्रूर मृत्यु के रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए, तो वे अपने आपको बचा नहीं पाये। यही हाल उन आधुनिक नास्तिकों का है, जो भगवान् की सत्ता की अवमानना करते हैं। ऐसे नास्तिकों को वैसा ही दण्ड मिलेगा, क्योंकि इतिहास की पुनरावृत्ति होती है। जब-जब लोग ईश्वर की सत्ता की उपेक्षा करते हैं, तब-तब प्रकृति तथा उसके नियम उन्हें दण्ड देते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता के इस सुप्रसिद्ध श्लोक द्वारा भी होती है—यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि:—जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब हे अर्जुन! में स्वयं अवतरित होता हूँ।”(भगवद्गीता ४.७) परमेश्वर परम पूर्ण हैं, इसकी पुष्टि समस्त श्रुति मन्त्रों द्वारा होती है। श्रुति मन्त्रों में ही कहा गया है कि परम पूर्ण भगवान् ने पदार्थ के ऊपर दृष्टि फेरी तो सारे जीव उत्पन्न हो गये। ये जीव भगवान् के अंश-रूप हैं। वे ही इस विशाल भौतिक सृष्टि को आध्यात्मिक स्फुलिंग रूपी बीज से आविष्ट करते हैं और इस प्रकार सृजनात्मक शक्तियाँ चालू हो जाती हैं जिससे अनेक आश्चर्यजनक सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं। नास्तिक यह तर्क कर सकता है कि ईश्वर घड़ीसाज से अधिक पटु नहीं हैं, किन्तु ईश्वर इससे अधिक पटु होते हैं, क्योंकि वे मशीनों के नर तथा मादा दोनों रूपों को उत्पन्न कर सकते हैं। फिर ये विविध नर-मादा मशीनें, ईश्वर के आदेश की प्रतीक्षा किये बिना, अपनी जैसी असंख्य मशीनें उत्पन्न करती जाती हैं। यदि मनुष्य ऐसी मशीन का जोड़ा बना सके जो उसके अनदेखे ही अन्य मशीनें उत्पन्न कर सके, तब जाकर वह ईश्वर की बुद्धि के पास पहुँच सकता है। किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्येक मशीन पर अलग-अलग कार्य करना होता है। अत: ईश्वर की तरह कोई भी व्यक्ति सृजन नहीं कर सकता। ईश्वर का अन्य नाम असमौर्ध्व है, जिसका अर्थ है कि कोई न तो उनके तुल्य है, न उनसे बढक़र है। परं सत्यम् वे हैं जिनके न तो कोई समतुल्य है न उनसे श्रेष्ठ। इसकी पुष्टि श्रुति मन्त्रों में की गई है। ऐसा कहा गया है कि इस भौतिक ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पूर्व भगवान् ही विद्यमान थे जो हर किसी के स्वामी हैं। उन्होंने ही ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान का उपदेश किया। इन्हीं भगवान् की आज्ञा सब प्रकार से पालनीय है। जो कोई भव-बन्धन से छूटना चाहता है, उसे उनकी शरण में जाना होगा। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी की गई है।

जब तक मनुष्य परमेश्वर के चरणकमलों की शरण ग्रहण नहीं करता, तब तक उसका मोहग्रस्त होना निश्चित है। जब कोई बुद्धिमान पुरुष कृष्ण के चरणारविन्द की शरण ग्रहण करके कृष्ण को समस्त कारणों का कारण मान लेता है, जैसा कि भगवद्गीता में भी कहा गया है, तभी वह व्यक्ति महात्मा बन सकता है। किन्तु ऐसे महात्मा यदा-कदा ही दिखते हैं। केवल ऐसे महात्मा समझ सकते हैं कि भगवान् ही समस्त सृष्टियों के आदि कारण हैं। वे परम या परम सत्य हैं, क्योंकि अन्य सारे सत्य उनसे जुड़े हुए हैं। वे सर्वज्ञ हैं। उनके लिए कोई मोह नहीं होता।

कुछ मायावादी विद्वान तर्क करते हैं कि श्रीमद्भागवत की रचना श्री व्यासदेव ने नहीं की और इन्हीं में कुछ लोग अपने विचार रखते हैं कि यह ग्रन्थ आधुनिक रचना है और वोपदेव नामक किसी व्यक्ति ने लिखा है। ऐसे व्यर्थ के तर्कों का खण्डन करते हुए श्री श्रीधर स्वामी कहते हैं कि कई प्राचीनतम पुराणों में भागवतम् का उल्लेख हुआ है। भागवत का पहला श्लोक गायत्री मन्त्र से प्रारम्भ होता है। इसका उल्लेख प्राचीनतम पुराण, मत्स्य पुराण में है। उस पुराण में भागवत में आये गायत्री मन्त्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आध्यात्मिक उपदेशों से युक्त अनेक कथाएँ हैं जो गायत्री मन्त्र से प्रारम्भ होती हैं और उसमें वृत्रासुर का इतिहास दिया गया है। यह भी उल्लेख है कि जो कोई पूर्णमासी के दिन इस महान ग्रन्थ का दान करता है उसे जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होती है और वह भगवान् के धाम वापस जाता है। अन्य पुराणों में भी भागवत का सन्दर्भ आया है, जिसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि यह ग्रंथ बारह स्कन्धों में पूर्ण हुआ है, जिसमें अठारह हजार श्लोक हैं। पद्म पुराण में भी गौतम तथा महाराज अम्बरीष की वार्ता में भागवत का उल्लेख हुआ है। वहाँ पर राजा को उपदेश दिया गया है कि यदि वे भवबन्धन से मोक्ष चाहते हैं, तो नियमित रूप से श्रीमद्भागवत का पाठ करें। ऐसी परिस्थितियों के अन्तर्गत भागवत की प्रामाणिकता असंदिग्ध है। विगत पाँच सौ वर्षों में अनेक प्रकाण्ड विद्वानों तथा आचार्यों, यथा जीव गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती, वल्लभाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु के पश्चात् भी अन्य अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने भागवत पर विशद टीकाएँ की हैं। ऐसे में गम्भीर अध्येता को चाहिए कि दिव्य उपदेशों के अधिक आस्वादन के लिए इन सबका अध्ययन करे।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने मौलिक तथा शुद्ध यौन-मनोविज्ञान (आदि-रस) की विशेष विवेचना की है, जो समस्त भौतिक उन्माद से रहित है। यह सारी भौतिक सृष्टि विषयी जीवन के सिद्धान्त के आधार पर गतिशील है। आधुनिक सभ्यता में विषयी जीवन ही सारे कार्यकलापों का केन्द्रबिन्दु है। जिधर भी कोई अपना मुख मोड़ता है, उधर उसे विषयी जीवन का प्राधान्य देखने को मिलता है। अत: विषयी जीवन अवास्तविक नहीं है। इसकी वास्तविकता आध्यात्मिक जगत में अनुभव की जाती है। भौतिक विषयी जीवन तो मौलिक तथ्य का विकृत प्रतिबिम्ब मात्र है। वास्तविक तथ्य तो परम सत्य में है, अत: परम सत्य कभी निराकार नहीं हो सकता। निराकार रहते हुए शुद्ध यौन जीवन रख पाना सम्भव नहीं है। फलस्वरूप निर्विशेषवादी चिन्तकों ने गर्हित सांसारिक विषयी जीवन को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिया है, क्योंकि उन्होंने परम सत्य की निराकारता (निर्विशेषता) पर अत्यधिक बल दिया है। इसीलिए काम के वास्तविक आध्यात्मिक रूप को न जानने के कारण, मनुष्यों ने विकृत भौतिक विषयी जीवन को ही सब कुछ मान रखा है। रुग्ण भौतिक अवस्था के विषयी जीवन तथा आध्यात्मिक विषयी जीवन में अन्तर है।

यह श्रीमद्भागवत पूर्वा ग्रहरहित पाठक को धीरे-धीरे अध्यात्म की पूर्णावस्था तक ले जाने वाला है। यह मनुष्य को भौतिक कार्यों के तीन प्रकार—सकाम कर्म, काल्पनिक दर्शन तथा कार्यकारी देवताओं की पूजा से ऊपर उठाने में सक्षम बनाएगा जिनका विधान वैदिक श्लोकों में है।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥