श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
प्रायेणाल्पायुष: सभ्य कलावस्मिन् युगे जना: ।
मन्दा: सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुता: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
प्रायेण—प्राय:; अल्प—न्यून; आयुष:—आयु, जीवन अवधि; सभ्य—विद्वत्समाज का सदस्य; कलौ—कलियुग में; अस्मिन्—यहाँ पर; युगे—युग में; जना:—लोग, जनता; मन्दा:—आलसी; सुमन्द-मतय:—पथभ्रष्ट; मन्द-भाग्या:— अभागे; हि—और तो और; उपद्रुता:—विचलित ।.
 
अनुवाद
 
 हे विद्वान, कलि के इस लौह-युग में लोगों की आयु न्यून है। वे झगड़ालू, आलसी, पथभ्रष्ट, अभागे होते हैं तथा साथ ही साथ सदैव विचलित रहते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्भक्त सामान्य जनों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए सदैव चिन्तित रहते हैं। जब नैमिषारण्य के मुनियों ने इस कलियुग के लोगों की अवस्था का विश्लेषण किया, तो उन्होंने देखा कि उनकी आयु कम होगी। कलियुग में आयु कम होने का कारण अपर्याप्त आहार नहीं, अपितु अनियमित आदतें हैं। आदतों को नियमित करके तथा सादा भोजन करके कोई भी व्यक्ति अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है। अधिक भोजन करना, अधिक इन्द्रियतृप्ति, दूसरों की दया पर अत्यधिक आश्रित रहना एवं रहन-सहन के कृत्रिम मानक मनुष्य की प्राणशक्ति तक को चूस लेते हैं। फलस्वरूप जीवन की अवधि घट जाती है।

इस युग के लोग न केवल भौतिक दृष्टि से, अपितु आत्म-साक्षात्कार के मामले में भी अत्यन्त आलसी हैं। यह मनुष्य-जीवन विशेष रूप से आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला है। अर्थात् मनुष्य को जानना चाहिए कि मैं क्या हूँ, संसार क्या है और परम सत्य क्या है। मनुष्य जीवन वह साधन है, जिससे जीव इस भौतिक जगत में कठिन जीवन-संघर्ष के कष्टों को मिटा सकता है और अपने सनातन घर, भगवद्धाम को लौट सकता है। किन्तु भ्रष्ट शिक्षा पद्धति के कारण लोगों में आत्म-साक्षात्कार की इच्छा ही नहीं उठती। यदि वे इसके विषय में जानते भी हैं, तो दुर्भाग्यवश वे पथभ्रष्ट शिक्षकों के शिकार बन जाते हैं।

इस युग में लोग न केवल विभिन्न राजनीतिक वर्गों तथा दलों के शिकार हैं, अपितु विभिन्न प्रकार के इन्द्रियतृप्ति करने वाले विपथनों से भी ग्रस्त हैं, जैसे कि सिनेमा, खेलकूद, जुआ, क्लब, संसारी पुस्तकालय, बुरी संगति, धूम्रपान, मदिरा-पान, छलावा, चोरी, मनमुटाव आदि- आदि। अनेकानेक व्यस्तताओं के कारण उनके मन सदैव विचलित एवं चिन्ताओं से ग्रस्त रहते हैं। इस युग में अनेक धूर्त लोग अपने-अपने धार्मिक पंथ खड़े कर देते हैं, जो किन्हीं शास्त्रों पर आधारित नहीं होते और प्राय: ऐसे लोग ही, जो इन्द्रियतृप्ति के व्यसनी हैं, ऐसी संस्थाओं के प्रति आकृष्ट होते रहते हैं। फलस्वरूप धर्म के नाम पर अनेक पापकर्म किये जाते हैं, जिसके कारण लोगों को न तो मानसिक शान्ति मिल पाती है, न स्वास्थ्य-लाभ हो पाता है। अब छात्र (ब्रह्मचारी) वर्ग का पालन नहीं किया जाता और गृहस्थ लोग गृहस्थाश्रम के विधि-विधानों का पालन नहीं करते। फलस्वरूप, तथाकथित वानप्रस्थ तथा संन्यासी जो ऐसे गृहस्थाश्रमों से आते हैं, अपने कठोर पथ से आसानी से विचलित हो जाते हैं। कलियुग में सारा परिवेश श्रद्धाविहीनता से पूर्ण है। लोग अब आध्यात्मिक मूल्यों में रुचि नहीं दिखाते। अब तो भौतिक इन्द्रियतृप्ति ही सभ्यता का मानदण्ड बनी हुई है। ऐसी भौतिक सभ्यता को बनाये रखने के लिए मनुष्य ने जटिल किस्मके राष्ट्रों तथा समुदायों का निर्माण किया है और विभिन्न गुटों में निरन्तर प्रत्यक्ष तथा शीत युद्ध की आशंका बनी रहती है। अतएव आज के मानव समाज के विकृत मानदण्डों के कारण आध्यात्मिक स्तर को उठा पाना अत्यन्त कठिन हो गया है। नैमिषारण्य के ऋषिमुनि पतितात्माओं को मुक्त करने के लिए उत्सुक हैं, अतएव वे श्रील सूत गोस्वामी से उपचार पूछ रहे हैं।

 
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