श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागश: ।
अत: साधोऽत्र यत्सारं समुद्‍धृत्य मनीषया ।
ब्रूहि भद्रायभूतानां येनात्मा सुप्रसीदति ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
भूरीणि—बहुमुखी; भूरि—अनेक; कर्माणि—कर्म, कर्तव्य; श्रोतव्यानि—सीखने योग्य; विभागश:—विषयानुसार; अत:—अतएव; साधो—हे साधु; अत्र—यहाँ पर; यत्—जो कुछ; सारम्—निष्कर्ष; समुद्धृत्य—चुनाव करके; मनीषया—अपने ज्ञान के अनुसार सर्वश्रेष्ठ; ब्रूहि—कृपा करके बताएँ; भद्राय—कल्याण के लिए; भूतानाम्—जीवों के; येन—जिससे; आत्मा—आत्मा; सुप्रसीदति—पूर्ण रूप से प्रसन्न हो जाती है ।.
 
अनुवाद
 
 शास्त्रों के अनेक विभाग हैं और उन सबमें अनेक नियमित कर्मों का उल्लेख है, जिनके विभिन्न प्रभागों को वर्षों तक अध्ययन करके ही सीखा जा सकता है। अत: हे साधु, कृपया आप इन समस्त शास्त्रों का सार चुनकर समस्त जीवों के कल्याण हेतु समझायें, जिससे उस उपदेश से उनके हृदय पूरी तरह तुष्ट हो जायँ।
 
तात्पर्य
 आत्मा अथवा स्व को पदार्थ तथा भौतिक तत्त्वों से पृथक् माना जाता है। इसका स्वरूप स्वभावत: आध्यात्मिक है, अत: यह किसी भी परिणाम के भौतिक आयोजनों से तुष्ट नहीं होता। सम्पूर्ण शास्त्र तथा आध्यात्मिक उपदेश इसी आत्मा की तुष्टि के निमित्त हैं। विभिन्न कालों तथा विभिन्न स्थानों में नाना-विध जीवों के लिए अनेक प्रकार के उपायों की संस्तुति की जाती है। फलस्वरूप, प्रामाणिक शास्त्रों की संख्या अनगिनत है। इन शास्त्रों में विभिन्न विधियों तथा नियमित कर्मों का विधान है। इस कलिकाल में सामान्य जनता की पतित अवस्था को ध्यान में रखते हुए, नैमिषारण्य के मुनियों ने श्री सूत गोस्वामी से अनुरोध किया कि वे इन समस्त शास्त्रों का सार कह सुनायें, क्योंकि इस युग में पतितात्माओं के लिए वर्णाश्रम पद्धति में इन विविध शास्त्रों के उपदेशों को पढऩा तथा समझ पाना सम्भव नहीं है।

मनुष्यों को आध्यात्मिक स्तर तक उठाने के लिए वर्णाश्रम वाले समाज को सर्वोत्कृष्ट संस्था माना जाता था, किन्तु कलियुग के कारण इन संस्थाओं के विधि-विधानों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं रह गया है। न ही जन-साधारण के लिए वर्णाश्रम संस्था द्वारा प्रतिपादित विधि के अनुसार अपने-अपने परिवारों से सम्बन्ध-विच्छेद कर पाना सम्भव है। सारा परिवेश विरोध से व्याप्त है। इस पर विचार करते हुए यह देखा जा सकता है कि इस युग में सामान्य जनों का आध्यात्मिक उत्थान अत्यन्त कठिन है। जिस कारण से मुनियों ने इस विषय को श्री सूत गोस्वामी के समक्ष रखा, उसकी व्याख्या अगले श्लोकों में की गई है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥