श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
यत्पादसंश्रया: सूत मुनय: प्रशमायना: ।
सद्य: पुनन्त्युपस्पृष्टा: स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसके; पाद—चरणकमल; संश्रया:—शरणागत; सूत—हे सूत गोस्वामी; मुनय:—बड़े-बड़े मुनिगण; प्रशमायना:—परमेश्वर की भक्ति में लीन; सद्य:—तुरन्त; पुनन्ति—पवित्र हो जाते हैं; उपस्पृष्टा:—केवल संगति से; स्वर्धुनी—पवित्र गंगा का; आप:—जल; अनुसेवया—उपयोग में लाने से ।.
 
अनुवाद
 
 हे सूत गोस्वामी, जिन महान ऋषियों ने पूर्ण रूप से भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है, वे अपने सम्पर्क में आने वालों को तुरन्त पवित्र कर देते हैं, जबकि गंगा जल दीर्घकाल तक उपयोग करने के बाद ही पवित्र कर पाता है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के शुद्ध भक्त पवित्र गंगा जल से भी अधिक शक्तिमान होते हैं। मनुष्य गंगाजल के दीर्घकालीन प्रयोग से ही आध्यात्मिक लाभ पा सकता है। किन्तु भगवान् के शुद्ध भक्त की कृपा से मनुष्य तुरन्त ही पवित्र हो सकता है। भगवद्गीता में कहा गया है कि चाहे कोई जन्म से शूद्र हो या स्त्री या वैश्य हो वह भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर सकता है और इस तरह वह भगवद्धाम को वापस लौट सकता है। भगवान् के चरणकमलों में शरण ग्रहण करने का अर्थ है, शुद्ध भक्तों की शरण ग्रहण करना। जिन शुद्ध भक्तों का एकमात्र कार्य भगवान् की सेवा करना है, वे प्रभुपाद तथा विष्णुपाद कहलाते हैं जो ऐसे भक्तों के भगवान् के चरणकमलों के प्रतिनिधि होने का द्योतक है। अत: जो भी व्यक्ति शुद्ध भक्त को अपना गुरु मान कर उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, वह तुरन्त शुद्ध हो जाता है। भगवान् के ऐसे भक्त भगवान् के ही समान आदरणीय हैं, क्योंकि वे भगवान् की गुह्यतम सेवा में लगे रहते हैं और वे उन पतितात्माओं का इस भवसागर से उद्धार कराते हैं, जिन्हें भगवान् अपने धाम में वापस बुलाना चाहते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसे शुद्ध भक्तों को तो उप-प्रभु कहा जाता है। शुद्ध भक्त का निष्ठावान शिष्य अपने गुरु को भगवान् के तुल्य मानता है, किन्तु अपने आपको भगवान् के दासों का भी दास समझता है। यही शुद्ध भक्ति का मार्ग है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥