श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभि: ।
ब्रूहि न: श्रद्दधानानां लीलया दधत: कला: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उनके; कर्माणि—दिव्य कर्म; उदाराणि—उदार; परिगीतानि—प्रसारित; सूरिभि:—महात्माओं द्वारा; ब्रूहि— कृपया कहें; न:—हमसे; श्रद्दधानानाम्—आदरपूर्वक ग्रहण करने के लिए उद्यत; लीलया—लीलाओं से; दधत:—धारण किये हुए; कला:—अवतार ।.
 
अनुवाद
 
 उनके दिव्य कर्म अत्यन्त उदार तथा अनुग्रहपूर्ण हैं और नारद जैसे महान् विद्वान मुनि उनका गायन करते हैं। अत: कृपया हमें उनके अपने विविध अवतारों में सम्पन्न साहसिक लीलाओं के विषय में बतायें, क्योंकि हम सुनने के लिए उत्सुक हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् कभी भी निष्क्रिय नहीं होते, जैसाकि कुछ अल्पज्ञ लोग सूचित करते हैं। उनके कर्म उदार तथा भव्य हैं। उनकी सृष्टियाँ, चाहे भौतिक हों या आध्यात्मिक, समान रूप से आश्चर्यजनक हैं और समस्त विविधताओं से परिपूर्ण हैं। इनका गुणगान श्रील नारद, व्यास, वाल्मीकि, देवल, असित, मध्व, श्री चैतन्य, रामानुज, विष्णु-स्वामी, निम्बार्क, श्रीधर, विश्वनाथ, बलदेव, भक्तिविनोद, भक्तिसिद्धान्त सरस्वती तथा अन्य अनेक विद्वानों एवं स्वरूपसिद्ध आत्माओं द्वारा किया जाता है। भौतिक एवं आध्यात्मिक ये दोनों प्रकार की सृष्टियाँ ऐश्वर्य, सौंदर्य तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं, किन्तु आध्यात्मिक जगत अपने सच्चिदानन्द स्वरूप के कारण अधिक भव्य है। भौतिक सृष्टियाँ कुछ काल के लिए अध्यात्म जगत के विकृत प्रतिबिम्बों के रुप में प्रकट होती हैं और उनकी तुलना सिनेमा से की जा सकती है। वे उन अल्पज्ञ लोगों को आकृष्ट करती हैं, जो मिथ्या वस्तुओं द्वारा आकृष्ट होते हैं। ऐसे मूर्ख व्यक्तियों को वास्तविकता का कुछ ज्ञान नहीं रहता और वे मिथ्या भौतिक स्वरूप को ही सब कुछ मान बैठते हैं। किन्तु अधिक बुद्धिमान व्यक्ति, जिन्हें व्यास तथा नारद जैसे मुनियों का मार्गदर्शन प्राप्त है, जानते हैं कि भगवान् का शाश्वत राज्य अधिक सुखी, अधिक विशाल तथा आनन्द एवं ज्ञान से नित्य परिपूर्ण है। जो लोग भगवान् के कार्यकलापों तथा उनके दिव्य धाम से परिचित नहीं हैं, उन्हें वे अवतार ले करके अपनी लीलाओं के माध्यम से अवगत कराते हैं, जिनमें वे अपने दिव्य धाम में संगति के शाश्वत आनन्द को प्रदर्शित करते हैं। ऐसे कार्यकलापों से भगवान् भौतिक जगत के बद्धजीवों को आकृष्ट कर लेते हैं। इन बद्धजीवों में से कुछ भौतिक इन्द्रियों के मिथ्या भोग में लिप्त रहते हैं और कुछ आध्यात्मिक जगत (वैकुण्ठ) के अपने वास्तविक जीवन को नकारते रहते हैं। ये अल्पज्ञ व्यक्ति कर्मी अर्थात् सकाम कर्म करने वाले तथा ज्ञानी अर्थात् शुष्क मनोधर्मी कहलाते हैं। किन्तु इन दो प्रकार के व्यक्तियों के भी ऊपर अध्यात्मवादी होता है, जो सात्वत या भक्त कहलाता है और जो न तो उग्र भौतिक कार्यकलापों में, न ही भौतिक चिन्तन में लीन रहता है। वह तो भगवान् की वास्तविक सेवा में तत्पर रहता है जिससे उसे सर्वोच्च आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है, जो कर्मियों तथा ज्ञानियों के लिए दुर्लभ है।

भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के परम नियन्ता के रूप में भगवान् के असीम श्रेणियों के विविध अवतार होते हैं। ब्रह्मा, रुद्र, मनु, पृथु तथा व्यास जैसे अवतार तो उनके भौतिक गुणात्मक अवतार हैं, लेकिन राम, नृसिंह, वराह तथा वामन जैसे अवतार उनके दिव्य अवतार कहलाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण इन समस्त अवतारों के प्रधान स्रोत हैं। अतएव वे ही समस्त कारणों के कारण हैं।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥