श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे ।
यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
वयम्—हम; तु—लेकिन; न—नहीं; वितृप्याम:—तृप्त हो जाएँगे; उत्तम-श्लोक—भगवान्, जिनका यशोगान दिव्य श्लोकों से किया जाता है; विक्रमे—साहसिक कार्य; यत्—जो; शृण्वताम्—निरन्तर सुनने से; रस—रस के; ज्ञानाम्— भिज्ञों को; स्वादु—स्वाद लेते हुए; स्वादु—सुस्वादु, स्वादिष्ट; पदे पदे—पग पग पर ।.
 
अनुवाद
 
 हम उन भगवान् की दिव्य लीलाओं को सुनते थकते नहीं, जिनका यशोगान स्तोत्रों तथा स्तुतियों से किया जाता है। उनके साथ दिव्य सम्बन्ध के लिए जिन्होंने अभिरुचि विकसित कर ली है, वे प्रतिक्षण उनकी लीलाओं के श्रवण का आस्वादन करते हैं।
 
तात्पर्य
 लौकिक कहानियों, कल्पित कथाओं या इतिहास तथा भगवान् की दिव्य लीलाओं में महान अन्तर होता है। समग्र ब्रह्माण्ड के इतिहास भगवान् के अवतारों की लीलाओं से भरे हुए हैं। रामायण, महाभारत तथा पुराण विगत युगों के इतिहास हैं, जिनमें भगवान् के अवतारों की लीलाओं के अभिलेख हैं, अत: बारम्बार पढऩे पर भी वे नये के नये लगते हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई चाहे तो भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का आजीवन बारम्बार पाठ करता रहे, फिर भी उसे उनमें ज्ञान का नवीन प्रकाश दिखेगा। लौकिक समाचार गतिहीन होते हैं, किन्तु दिव्य समाचार गतिशील होते हैं, जिस प्रकार कि आत्मा गतिशील है और पदार्थ गतिहीन है। जिन मनुष्यों ने दिव्य विषयों को समझने के लिए सुरुचि का विकास किया है, वे ऐसी कथाएँ सुनते कभी थकते नहीं। लौकिक कार्यकलापों से मनुष्य शीघ्र तृप्त हो जाता है, किन्तु दिव्य या भक्तिमय कार्यकलापों से कभी तृप्ति नहीं होती। उत्तमश्लोक उस साहित्य की ओर संकेत करता है, जो अज्ञानता के निमित्त नहीं है। लौकिक साहित्य तो तमोगुणी होता है, किन्तु आध्यात्मिक साहित्य सर्वथा भिन्न होता है। दिव्य साहित्य तमोगुण से परे होता है और इसे ज्यों-ज्यों और पढ़ा जाता है, त्यों-त्यों यह अधिक प्रकाशवान बनता जाता है तथा इस दिव्य विषय की अनुभूति और अधिक होती जाती है। तथाकथित मुक्त व्यक्ति अहं ब्रह्मास्मि शब्दों को बारम्बार उच्चरित करते संतुष्ट नहीं होते। ब्रह्म की ऐसी कृत्रिम अनुभूति उबाऊ है, फलत: वे भी वास्तविक आनन्द उठाने के लिए श्रीमद्भागवत की कथाओं की ओर मुड़ते हैं। जो लोग इतने भाग्यशाली नहीं हैं, वे परार्थवाद और दुनियायी परोपकार की ओर मुड़ते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मायावाद दर्शन लौकिक है, जबकि भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत का दर्शन दिव्य है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥