श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
कृतवान् किल कर्माणि सह रामेण केशव: ।
अतिमर्त्यानि भगवान् गूढ: कपटमानुष: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
कृतवान्—किये गये; किल—कौन-कौन से; कर्माणि—कार्य; सह—सहित; रामेण—बलराम; केशव:—श्रीकृष्ण ने; अतिमर्त्यानि—अलौकिक; भगवान्—भगवान्; गूढ:—प्रच्छन्न; कपट—ऊपर से; मानुष:—मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम सहित मनुष्य की भाँति क्रीड़ाएँ कीं और इस प्रकार से प्रच्छन्न रह कर उन्होंने अनेक अलौकिक कृत्य किये।
 
तात्पर्य
 श्रीकृष्ण या भगवान् पर मानव-विकास तथा पशु-विकास के सिद्धान्त लागू नहीं होते। आजकल, विशेष रूप से भारत में, इस सिद्धान्त का बोलबाला है कि तपस्या तथा आत्म- संयम के बल पर मनुष्य ईश्वर बन जाता है। चूँकि भगवान् राम, भगवान् कृष्ण तथा भगवान् चैतन्य महाप्रभु को प्रमाणभूत शास्त्रों में बताये गये संकेतों के आधार पर ऋषियों तथा मुनियों ने भगवान् के रूप में पहचाना था, अतएव अनेक धूर्त व्यक्तियों ने अपने खुद के अवतारों की सृष्टि करली है। अब तो भगवान् के अवतार का गढ़ा जाना, विशेष रूप से बंगाल में, सामान्य व्यापार बन चुका है। कोई भी लोकप्रिय व्यक्ति कुछ योग-शक्तियाँ दिखलाकर तथा बाजीगरी के कुछ करतब दिखलाकर, लोकप्रिय मत-प्रस्ताव द्वारा भगवान् का अवतार बन जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार के अवतार न थे। वे अपने आविर्भाव काल से ही वास्तविक रूप से भगवान् थे। वे अपनी तथाकथित माता के समक्ष चतुर्भुज विष्णु रूप में प्रकट हुए थे और फिर अपनी माता के अनुरोध पर बालक रूप में परिणत हो गये थे। वे तुरन्त ही अपनी इस माता को छोडक़र गोकुल में अपने एक और भक्त के यहाँ चले गये, जहाँ उन्हें नन्द महाराज तथा यशोदा माता ने अपने पुत्र रूप में स्वीकार किया। इसी प्रकार श्री बलराम भी, जो भगवान् कृष्ण के पूरक हैं, श्री वसुदेव की अन्य पत्नी से उत्पन्न बालक समझे जाते हैं। भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि उनका जन्म तथा उनके कर्म दिव्य हैं और जो भाग्यशाली व्यक्ति उनके जन्म तथा कर्म की दिव्य प्रकृति को जान लेता है, वह तुरन्त मुक्त होकर भगवद्धाम को जा सकता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण के जन्म तथा कर्म की दिव्य प्रकृति का ज्ञान ही मुक्त होने के लिए पर्याप्त है। भागवत में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रकृति का वर्णन नौ स्कंधों में हुआ है और दसवें स्कंध में उनकी विशिष्ट लीलाएँ दी गई हैं। इस ग्रन्थ को ज्यों-ज्यों कोई पढ़ता है, त्यों-त्यों यह सब ज्ञात होता जाता है। किन्तु यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि भगवान् ने माता की गोद में से ही अपनी अलौकिकता प्रदर्शित की और उनके सारे के सारे कार्यकलाप अतिमानवीय हैं (यथा सात वर्ष की आयु में गोवर्धन पर्वत को उठाना) और ये सारे कार्य उन्हें वास्तविक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सिद्ध करते हैं। इतने पर भी अपने योगावरण के कारण वे अपने तथाकथित माता-पिता तथा अन्य परिजनों द्वारा सदैव एक सामान्य मानव शिशु ही समझे जाते रहे। जब भी वे कोई अत्यन्त पराक्रमी कार्य करते, उनके माता-पिता उसे अन्य रूप में ग्रहण करते। इस प्रकार वे अपने पुत्र के प्रति अविचल प्रेम से सदा तुष्ट रहते। अतएव नैमिषारण्य के ऋषिगण उन्हें मनुष्यवत् बताते हैं, लेकिन वास्तव में वे परम शक्तिमान भगवान् हैं।
 
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