श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 1: मुनियों की जिज्ञासा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।
ब्रूयु: स्‍निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
वेत्थ—पूर्ण रूप से निष्णात्; त्वम्—आप; सौम्य—शुद्ध तथा सरल व्यक्ति; तत्—वह; सर्वम्—समस्त; तत्त्वत:— वास्तव में; तत्—उनका; अनुग्रहात्—अनुग्रह से; ब्रूयु:—कहेंगे; स्निग्धस्य—विनीत; शिष्यस्य—शिष्य का; गुरव:— गुरुजन; गुह्यम्—गुप्त, रहस्य; अपि उत—से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 इससे भी अधिक, चूँकि आप विनीत हैं, आपके गुरुओं ने एक सौम्य शिष्य जानकर आप पर सभी तरह से अनुग्रह किया है अत: आप हमें वह सब बतायें जिसे आपने उनसे वैज्ञानिक ढंग से सीखा है।
 
तात्पर्य
 आध्यात्मिक जीवन की सफलता का रहस्य गुरु को तुष्ट करने तथा उनकी शुभाशीष प्राप्त करने में है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने गुरु के विषय में अपने सुप्रसिद्ध आठ श्लोकों में इस प्रकार गाया है : “मैं अपने गुरु के चरणारविन्दों में नमस्कार करता हूँ। उनको तुष्ट करके ही कोई भगवान् को प्रसन्न कर सकता है और जब वे अप्रसन्न रहते हैं, तो आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में विघ्न ही विघ्न आते हैं।” अत: यह आवश्यक है कि शिष्य अपने प्रामाणिक गुरु के प्रति अत्यन्त आज्ञाकारी तथा विनीत रहे। श्रील सूत गोस्वामी शिष्य के इन सारे गुणों से ओतप्रोत थे, अत: उन पर विद्वान एवं स्वरूपसिद्ध आध्यात्मिक गुरुओं तथा श्रील व्यासदेव तथा अन्य गुरुओं की कृपा दृष्टि थी। नैमिषारण्य के मुनियों को पूर्ण विश्वास था कि श्रील सूत गोस्वामी प्रामाणिक व्यक्तित्व हैं, इसीलिए वे उनसे सुनने के लिए उत्सुक थे।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥