श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
न्यरुन्धन्नुद्गलद्बाष्पमौत्कण्ठ्याद्देवकीसुते ।
निर्यात्यगारान्नोऽभद्रमिति स्याद्ब‍ान्धवस्त्रिय: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
न्यरुन्धन्—बड़ी मुश्किल से रोकते हुए; उद्गलत्—उमड़ते हुए; बाष्पम्—आँसुओं को; औत्कण्ठ्यात्—अत्यधिक उत्सुकता से; देवकी-सुते—देवकी के पुत्र में; निर्याति—बाहर निकल कर; अगारात्—महल से; न:—नहीं; अभद्रम्— अशुभ; इति—इस प्रकार; स्यात्—होए; बान्धव—सम्बन्धियों की; स्त्रिय:—स्त्रियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 सगी-सम्बन्धी (नातेदार) स्त्रियाँ, जिनके नेत्रों से कृष्ण के लिए व्याकुलतावश अश्रुधारा निकल रही थी, महल से बाहर आ गईं। वे बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोक पाईं। उन्हें भय था कि प्रस्थान के अवसर पर आँसुओं से अपशकुन हो सकता है।
 
तात्पर्य
 हस्तिनापुर के राजमहल में सैकड़ों महिलाएँ थीं। वे सभी कृष्ण के प्रति स्नेहमयी थीं। वे सभी उनकी रिश्तेदार भी थीं। जब उन्होंने देखा कि कृष्ण अपनी मातृभूमि को जाने के लिए महल से निकल रहे हैं, तो वे उनके लिए अत्यन्त व्याकुल हो उठ्ठीं और जैसा स्वाभाविक था, उनके अश्रु ढुलक-ढुलक कर कपोलों पर आने लगे। उसी समय उन्होंने सोचा कि उस समय उनके अश्रु कृष्ण के लिए अमंगलसूचक हो सकते हैं, अतएव उन्होंने अश्रुओं को रोकना चाहा। ऐसा करना उनके लिए बहुत कठिन था, क्योंकि अश्रु रुक नहीं पा रहे थे। अत: उन्होंने आँखों के अश्रुओं को पोंछा और उनके हृदय धडक़ने लगे। वे स्त्रियाँ जिनके पति या श्वसुर युद्ध में मारे गये थे, कृष्ण के प्रत्यक्ष सम्पर्क में नहीं आ सकीं थीं। लेकिन वे सब कृष्ण तथा उनके महान कार्यों के विषय में सुनती रहती थीं। इस प्रकार वे उनके विषय में सोचतीं, उनके नाम तथा यश के विषय में बातें करतीं और उन स्त्रियों के समान स्नेहिल हो गई थीं जो उनके प्रत्यक्ष सम्पर्क में थीं। अतएव जो कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण के विषय में सोचता है, कृष्ण के विषय में बातें करता है या कृष्ण की पूजा करता है, वह उनके प्रति अनुरक्त हो जाता है। चूँकि कृष्ण परम पूर्ण हैं, अत: उनके नाम, रूप, गुण आदि में कोई अन्तर नहीं है। हम कृष्ण के साथ अपने घनिष्ठ सम्बन्ध को उनके विषय में बातें करके, श्रवण करके या स्मरण करके पुनरुज्जीवित कर सकते हैं। आध्यात्मिक सामर्थ्य से ही ऐसा हो पाता है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥