श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
मृदङ्गशङ्खभेर्यश्च वीणापणवगोमुखा: ।
धुन्धुर्यानकघण्टाद्या नेदुर्दुन्दुभयस्तथा ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
मृदङ्ग—मीठी ध्वनि उत्पन्न करनेवाला ढोल; शङ्ख—शंख; भेर्य:—भेरी; च—तथा; वीणा—तंतुयुक्त वाद्ययन्त्र, वीणा; पणव—एक प्रकार की वंशी; गोमुखा:—अन्य प्रकार की बाँसुरी; धुन्धुरी—एक प्रकार का ढोल; आनक—नगाड़ा; घण्टा—बजाया जानेवाला घंटा; आद्या:—इत्यादि; नेदु:—बजे; दुन्दुभय:—विभिन्न प्रकार के ढोल; तथा—उस समय ।.
 
अनुवाद
 
 हस्तिनापुर के राजमहल से भगवान् के प्रस्थान समय, उनके सम्मान में विभिन्न प्रकार के ढोल—यथा मृदंग, ढोल, नगाड़े, धुंधुरी तथा दुन्दुभी—एवं तरह-तरह की वंशियाँ, वीणा, गोमुख और भेरियाँ एकसाथ बज उठे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥