श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
सितातपत्रं जग्राह मुक्तादामविभूषितम् ।
रत्नदण्डं गुडाकेश: प्रिय: प्रियतमस्य ह ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
सित-आतपत्रम्—सुखद छाता; जग्राह—ले लिया; मुक्ता-दाम—मोतियों तथा झालर से सजा; विभूषितम्—किनारी लगा; रत्न-दण्डम्—रत्नों के हत्थे वाला; गुडाकेश:—अर्जुन, पटु योद्धा के रूप में अथवा जिसने नींद जीत ली है; प्रिय:—अत्यन्त प्यारा; प्रियतमस्य—अत्यन्त प्रिय का; ह—ऐसा ही किया ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय महान् योद्धा तथा निद्रा को जीतनेवाले अर्जुन ने, जो परम प्रिय भगवान् का घनिष्ठ मित्र था, एक छाता ले लिया जिसका हत्था रत्नों का था और जिसमें मोतियों की झालर लगी थी।
 
तात्पर्य
 विलासपूर्ण राजसी उत्सवों में सोना, रत्न, मोती तथा मूल्यवान पत्थरों का प्रयोग होता था। ये सब प्रकृति के उपहार हैं और भगवान् के आदेश से पर्वतों, समुद्रों द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं और तब वे उत्पन्न होते हैं, जब मनुष्य आवश्यकता के नाम पर व्यर्थ वस्तुओं के निर्मित करने में अपना अमूल्य समय नहीं गँवाता। औद्योगिक उपक्रमों के तथाकथित विकास से वे सोना, चाँदी, पीतल तथा ताँबा जैसी धातुओं के बजाय गटापारचा के बर्तनों को काम में लाते हैं। वे शुद्ध घी (मार्गरीन) के स्थान पर कृत्रिम घी का प्रयोग कर रहे हैं और शहरी जनसंख्या के चौथाई भाग के पास रहने के लिए कोई आश्रयस्थान नहीं है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥