श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 20

 
श्लोक
अन्योन्यमासीत्सञ्जल्प उत्तमश्लोकचेतसाम् ।
कौरवेन्द्रपुरस्त्रीणां सर्वश्रुतिमनोहर: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
अन्योन्यम्—एक दूसरे में; आसीत्—था; सञ्जल्प:—बात; उत्तम-श्लोक—परमेश्वर, जिनकी प्रशंसा चुने हुए श्लोकों से की जाती है; चेतसाम्—जिनके हृदय इस प्रकार लीन हैं उनका; कौरव-इन्द्र—कुरुओं का राजा; पुर—राजधानी; स्त्रीणाम्—स्त्रियों का; सर्व—समस्त; श्रुति—वेद; मन:-हर:—मन को मोहित करनेवाला ।.
 
अनुवाद
 
 चुने हुए छन्दों से जिनकी स्तुति की जाती है, ऐसे भगवान् के दिव्य गुणों के विचार में डूबीं, हस्तिनापुर के सभी घरों की छतों पर चढ़ी हुई स्त्रियाँ, उनके विषय में बातें करने लगीं। ये बातें वैदिक स्तोत्रों से कहीं अधिक आकर्षक थीं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि समस्त वैदिक वाङ्मय का लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वस्तुत: भगवान् का यशोगान वेदों, रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रंथों में अंकित है। और भागवत में तो विशेष रूप से परमेश्वर का यशोगान हुआ है। अतएव जब कुरुवंश के राजाओं की राजधानी में घरों की छतों पर स्त्रियाँ भगवान् के विषय में बातें कर रही थीं, तो उनकी बातें वैदिक स्तोत्रों से अधिक मनोहर लग रही थीं। भगवान् की प्रशंसा में जो भी गाया जाय, वह श्रुतिमन्त्र है। गौड़ीय़ सम्प्रदायके आचार्य ठाकुर नरोत्तमदास ने सरल बाँग्ला भाषा में अनेक गीत लिखे हैं। लेकिन उसी सम्प्रदाय के एक अत्यन्त अन्य विद्वान आचार्य ठाकुर विश्वनाथ चक्रवर्ती ने नरोत्तमदास के इन गीतों को वैदिक-मन्त्रों
के ही समान बताया है। इसका कारण है इनकी विषयवस्तु। भाषा का उतना महत्त्व नहीं है, विषयवस्तु की महत्ता होती है। उन सारी स्त्रियों में, जो कि भगवान् के विचार तथा कार्यों में लीन थीं, भगवान् की कृपा से वैदिक वाङ्मय की सी चेतना का विकास हो आया था। अतएव, भले ही वे स्त्रियाँ संस्कृत की अच्छी विद्वान न रही हों, तो भी उनकी बातें वैदिक स्तोत्रों की अपेक्षा अधिक मनोहर लग रही थीं। उपनिषदों में वैदिक स्तोत्र कभी-कभी अप्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के प्रति व्यक्त होते हैं। लेकिन स्त्रियों की बातें प्रत्यक्ष रूप से भगवान् के विषय में थीं, अतएव वे अधिक हृदयग्राही थीं। स्त्रियों की बातें विद्वान ब्राह्मणों के आशीर्वादों से अधिक मूल्यवान लग रही थीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥