श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
स वै किलायं पुरुष: पुरातनो
य एक आसीदविशेष आत्मनि ।
अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे
निमीलितात्मन्निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वे (कृष्ण); वै—जैसा मुझे स्मरण है; किल—निश्चित रूप से; अयम्—यह; पुरुष:—भगवान्; पुरातन:—आदि; य:—जो; एक:—एकमात्र; आसीत्—विद्यमान थे; अविशेष:—भौतिक रूप से अव्यक्त; आत्मनि—स्वयं; अग्रे—सृष्टि के पूर्व; गुणेभ्य:—प्रकृति के गुणों का; जगत्-आत्मनि—परमात्मा में; ईश्वरे—भगवान् में; निमीलित—लीन; आत्मन्— जीव; निशि सुप्त—रात्रि में सोया हुआ; शक्तिषु—शक्तियों का ।.
 
अनुवाद
 
 वे कहने लगीं : जैसा हमें निश्चित रूप से स्मरण है, यही हैं वे, जो आदि परमेश्वर हैं। प्रकृति के गुणों की व्यक्त सृष्टि के पूर्व, वे ही अकेले विद्यमान थे। चूँकि वे परमेश्वर हैं, अतएव सारे जीव उन्हीं में लीन होते हैं, मानो रात्रि में सोये हुए हों और उनकी शक्ति रुक गई हो।
 
तात्पर्य
 इस दृश्य जगत का विलय दो प्रकार से होता है। हर ४,३२,००,००,००० सौर वर्षों के बाद, जब एक ब्रह्माण्ड विशेष के स्वामी, ब्रह्मा, शयन करते हैं तो एक प्रलय होता है। ब्रह्मा की एक सौ वर्ष की आयु के अन्त में (हमारी गणना के अनुसार ८,६४,००,००,००० × ३० × १२ × १०० सौर वर्ष) सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पूर्ण प्रलय होता है और दोनों ही बार, महत्तत्त्व अर्थात् भौतिक शक्ति तथा जीवतत्व अर्थात् तटस्था शक्ति, भगवान् के शरीर में लीन हो जाती हैं। सारे जीव भगवान् के शरीर में तब तक सुप्त रहते हैं, जब तक जगत की दूसरी सृष्टि नहीं हो जाती। भौतिक जगत की सृष्टि, पालन तथा संहार का यही विधान है।

भगवान् द्वारा गतिमान किये जाने पर, भौतिक प्रकृति के तीन गुणों की अन्त:क्रिया से भौतिक सृष्टि होती है, इसीलिए यहाँ पर कहा गया है कि भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के गतिमान होने के पूर्व भगवान् विद्यमान थे। श्रुति मन्त्र में कहा गया है कि सृष्टि के पूर्व केवल सर्वोपरि भगवान् विष्णु का अस्तित्व था, तब न तो ब्रह्मा थे, न शिव, न ही कोई अन्य देवता। विष्णु का अर्थ है महाविष्णु, जो कारणार्णव समुद्र में लेटे हुए हैं। उनकी श्वास से ही सारे ब्रह्माण्ड बीज-रूप में उत्पन्न होते हैं और धीरे-धीरे प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भीतर असंख्य ग्रहों का विराट रूप विकसित होता है। ब्रह्माण्डों के बीज उसी तरह विशाल आकार ग्रहण करते हैं, जिस प्रकार एक वटवृक्ष के बीजों से असंख्य वटवृक्ष विकसित हो आते हैं।

ये महाविष्णु भगवान् श्रीकृष्ण के पूर्ण अंश हैं, जिनका उल्लेख ब्रह्म-संहिता में इस प्रकार हुआ है—

“मैं उन आदि भगवान् गोविंद को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके पूर्ण अंश महाविष्णु हैं। ब्रह्माण्डों के अगुवा सारे ब्रह्मा, उनके दिव्य शरीर के रोमकूपों से उत्पन्न ब्रह्माण्डों के पश्चात्, उतने ही समय तक जीवित रहते हैं जितने में भगवान् श्वास छोड़ते हैं।” (ब्रह्म-संहिता ५.५८) इस प्रकार गोविन्द अर्थात् भगवान् कृष्ण महाविष्णु के भी कारण-स्वरूप हैं। स्त्रियों ने यह वैदिक सत्य किसी प्रामाणिक स्रोत से सुन रखा होगा, तभी वे इसके विषय में बातें कर रही थीं। दिव्य विषयों के सही-सही ज्ञान पाने का एकमात्र साधन होता है, कोई प्रामाणिक स्रोत। इसका कोई विकल्प नहीं है।

महाविष्णु के शरीर में जीवों का प्रवेश, ब्रह्मा के एक सौ वर्ष बाद स्वत: हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्तिगत जीव अपनी सत्ता (पहचान) खो देता है। सत्ता तो बनी ही रहती है और ज्योंही भगवान् की परम इच्छा से दूसरी सृष्टि होती है, तो सारे सुप्त, निष्क्रिय जीवों को छोड़ दिया जाता है, जिससे वे अपने पूर्व जीवन के विभिन्न कार्यक्षेत्रों के अनुसार अपने कार्यों को आगे बढ़ा सकते हैं। यह सुप्तोत्थित न्याय अर्थात् ‘निद्रा से जगकर पुन: अपने कर्म में लग जाना’ कहलाता है। रात्रि में जब मनुष्य सोता है, तब वह यह भूल जाता है कि वह कौन है, उसका क्या कर्तव्य है और वह जगते समय की सारी बातें भूल जाता है। किन्तु ज्योंही वह नींद से उठता है, तो उसे जो कुछ करना होता है, सब स्मरण हो आता है और वह फिर से अपने कार्यकलाप में लग जाता है। सारे जीव भी,प्रलय के समय, महाविष्णु के शरीर में लीन रहते हैं, किन्तु ज्योंही दूसरी सृष्टि होती है, वे उठकर अपना अधूरा काम पूरा करने लगते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (८.१८-२०) में भी हुई है।

सृजनात्मक शक्ति के सक्रिय अवस्था में आने के पूर्व भगवान् का अस्तित्व था। भगवान् भौतिक शक्ति से उत्पन्न नहीं हुए हैं। उनका शरीर पूर्ण रूप से आध्यात्मिक है और उनके शरीर तथा उनमें कोई अन्तर नहीं है। सृष्टि के पूर्व भगवान् अपने परम धाम में रहते थे, जो परम पूर्ण और अद्वितीय है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥