श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
अहो अलं श्लाघ्यतमं यदो: कुल-
महो अलं पुण्यतमं मधोर्वनम् ।
यदेष पुंसामृषभ: श्रिय: पति:
स्वजन्मना चङ्‍क्रमणेन चाञ्चति ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; अलम्—सचमुच; श्लाघ्य-तमम्—सर्वाधिक यशस्वी; यदो:—यदु राजा के; कुलम्—वंश; अहो—ओह; अलम्—सचमुच; पुण्य-तमम्—अत्यन्त पुण्यात्मा; मधो: वनम्—मथुरा की भूमि; यत्—क्योंकि; एष:—यह; पुंसाम्— समस्त जीवों का; ऋषभ:—परम नायक; श्रिय:—लक्ष्मी के; पति:—पति; स्व-जन्मना—अपने आविर्भाव से; चङ्क्रमणेन—विचरण द्वारा; च अञ्चति—महिमा ।.
 
अनुवाद
 
 ओह, यदुवंश कितना यशस्वी है और मथुरा की भूमि कितनी पुण्यमयी है, जहाँ समस्त जीवों के परम नायक, लक्ष्मीपति ने जन्म लिया और अपने बचपन में विचरण किया है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य प्रादुर्भाव, तिरोधान तथा लीलाओं का विशद वर्णन किया है। भगवान् अपनी अकल्पनीय शक्ति से किसी परिवार या स्थान विशेष में प्रकट होते हैं। वे बद्धजीव की भाँति जन्म लेकर एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण नहीं करते। उनका जन्म सूर्योदय तथा सूर्यास्त की भाँति होता है। सूर्य पूर्वी-क्षितिज में उदय होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि पूर्वी क्षितिज उसका जनक है। सौरमण्डल के प्रत्येक भाग में सूर्य का अस्तित्व रहता है, किन्तु वह एक निश्चित समय पर दृष्टिगोचर होता है और फिर उसी तरह किसी अन्य निश्चित समय पर अस्त हो जाता है। इसी तरह भगवान् इस ब्रह्माण्ड में सूर्य की भाँति प्रकट होकर फिर हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। वे हर समय, हर स्थान पर विद्यमान रहते हैं, लेकिन जब वे अपनी अहैतुकी कृपावश हमारे समक्ष प्रकट होते हैं, तो हम मान बैठते हैं कि उन्होंने जन्म लिया है। जो कोई इस सत्य को शास्त्रों के कथनानुसार समझ लेता है, वह वर्तमान शरीर त्याग करते ही मुक्त हो जाता है। मोक्ष अनेक जन्मों के बाद और वह भी धैर्य और लगन एवं ज्ञान तथा वैराग्य में रहते हुए गहन प्रयास के बाद प्राप्त होता है। लेकिन यदि कोई भगवान् के दिव्य जन्म तथा कर्म के मर्म को सचमुच समझ लेता है, तो वह तुरन्त मोक्ष पा लेता है। यह भगवद्गीता का निर्णय है। लेकिन जो अविद्या के अन्धकार में हैं, वे यह मान बैठते हैं कि भगवान् के जन्म तथा कर्म भौतिक जगत में एक सामान्य व्यक्ति जैसे होते है। ऐसे अपूर्ण निष्कर्ष से किसी को भी मोक्ष नहीं मिल सकता। अतएव यदुवंश में राजा वसुदेव के पुत्र के रूप में उनका जन्म और मथुरा भूमि में नंद महाराज के परिवार में उनका भेजा जाना—ये सब भगवान् की अन्तरंगा शक्ति की दिव्य योजनाएँ हैं। यदुवंश तथा मथुरावासियों के सौभाग्य का अनुमान भौतिक दृष्टि से नहीं लगाया जा सकता। यदि भगवान् के जन्म तथा कर्म की दिव्य प्रकृति को जान लेने मात्र से सरलता से मोक्ष मिल सकता है, तो फिर जिन लोगों ने उनके पारिवारिक सदस्य के रूप में, या पड़ोसी रूप में, भगवान् की संगति का वास्तविक भोग किया है, उनके भाग्य का क्या कहना? जिन लोगों को लक्ष्मीपति भगवान् के सान्निध्य का सुअवसर प्राप्त हुआ, उन्हें तो निश्चित रूप से मुक्ति से बढक़र उपलब्धि हुई होगी। अतएव सचमुच ही, भगवान् की कृपा से उनका वंश तथा उनकी भूमि, दोनों ही सदैव यशस्वी हैं।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥