श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
नूनं व्रतस्‍नानहुतादिनेश्वर:
समर्चितो ह्यस्य गृहीतपाणिभि: ।
पिबन्ति या: सख्यधरामृतं मुहु-
र्व्रजस्त्रिय: सम्मुमुहुर्यदाशया: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—निश्चय ही पूर्व जन्म में; व्रत—अनुष्ठान, व्रत; स्नान—स्नान; हुत—अग्नि में आहुति; आदिना—आदि द्वारा; ईश्वर:—भगवान्; समर्चित:—पूरी तरह से पूजित; हि—निश्चय ही; अस्य—उनका; गृहीत-पाणिभि:—विवाहिता स्त्रियों द्वारा; पिबन्ति—स्वाद लेते हैं; या:—जो; सखि—हे सखी; अधर-अमृतम्—उनके होंठों का अमृत; मुहु:—पुन: पुन:; व्रज-स्त्रिय:—व्रजभूमि की बालाएँ; सम्मुमुहु:—बहुधा मूर्छित हो जाती थीं; यत्-आशया:—इस प्रकार से अनुग्रह की आशा करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे सखियो, तनिक उनकी पत्नियों के विषय में सोचो, जिनके साथ उनका पाणिग्रहण हुआ था। उन्होंने कैसा व्रत, स्नान, यज्ञ तथा ब्रह्माण्ड के स्वामी की सम्यक् पूजा की होगी, जिससे वे सब उनके अधरामृत का निरन्तर आस्वादन (चुम्बन द्वारा) कर रही हैं? ब्रजभूमि की बालाएँ ऐसी कृपा की कल्पना से ही प्राय: मूर्छित हो जाती होंगी।
 
तात्पर्य
 शास्त्रों में दिये गये धार्मिक अनुष्ठान बद्धजीवों को सांसारिक गुणों से परिशुद्ध करने के निमित्त हैं, जिससे वे धीरे-धीरे परमेश्वर की दिव्य सेवा करने का अवसर पाने की अवस्था तक ऊपर उठ सकें। शुद्ध आध्यात्मिक जीवन की इस अवस्था को प्राप्त करना सर्वोच्च सिद्धि है और यह अवस्था जीवात्मा की वास्तविक पहचान अथवा स्वरूप कहलाती है। मुक्ति का अर्थ है, इस स्वरूप अवस्था का नवीकरण। स्वरूप की उस पूर्णावस्था में जीव प्रेमाभक्ति की पाँच अवस्थाओं में स्थापित होता है, जिनमें से एक अवस्था माधुर्य रस अथवा युगल प्रेम की मनोदशा भी है। भगवान् सदैव अपने में पूर्ण होते हैं, अतएव उन्हें अपने लिए किसी प्रकार की लालसा नहीं रहती। किन्तु अपने भक्त के प्रगाढ़ प्रेम की पूर्ति के लिए वे स्वामी, सखा, पुत्र या पति बनते रहते हैं। यहाँ पर माधुर्य रस के दो प्रकार के भक्तों का उल्लेख हुआ है। एक है स्वकीय तथा दूसरा है परकीय। दोनों ही सम्बन्ध भगवान् कृष्ण के साथ माधुर्य रस के होते हैं। द्वारका की रानियाँ स्वकीया थीं, अर्थात् वे विधिवत रूप से ब्याही हुई थीं, लेकिन व्रज की बालाएँ उनकी तब की तरुण मित्र थीं, जब वे अनब्याहे थे। भगवान् सोलह वर्ष की उम्र तक वृन्दावन में रहे और पास पड़ोस की लड़कियों के साथ उनका मैत्री भाव परकीय था। इन बालिकाओं तथा रानियों को शास्त्रोक्त व्रत, स्नान तथा अग्नि यज्ञ द्वारा कठिन तपस्याएँ करनी पड़ीं। लेकिन ये सब अनुष्ठान अपने आप में परिपूर्ण नहीं है, न सकाम कर्म और ज्ञान का अनुशीलन या योग की सिद्धि ही अपने में पूर्ण हैं। ये सब स्वरूप की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने के निमित्त हैं, भगवान् की वैधानिक दिव्य सेवा करने के लिए हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इन पाँच अवस्थाओं में से किसी एक से भगवान् से सम्बन्ध स्थापित करना होता है और शुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप होने पर यह सम्बन्ध किसी सांसारिक आकर्षण के बिना प्रकट होता है। उनकी पत्नियों द्वारा या भगवान् को प्रेमी रूप में चाहनेवाली तरुणी गोपियों द्वारा कृष्ण का चुम्बन लेना कोई विकृत संसारी गुण नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो शुकदेव जैसे मुक्तात्मा ने उनका आस्वाद करने का कष्ट न उठाया होता, न ही भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु गृहस्थ जीवन त्याग करने के पश्चात् इन विषयों के प्रति आकृष्ट हुए होते। यह अवस्था कई जन्मों तक तपस्या करने के बाद प्राप्त होती है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥