श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
नद्य: समुद्रा गिरय: सवनस्पतिवीरुध: ।
फलन्त्योषधय: सर्वा: काममन्वृतु तस्य वै ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
नद्य:—नदियाँ; समुद्रा:—समुद्र; गिरय:—पहाड़; सवनस्पति—वनस्पतियाँ; वीरुध:—लताएँ; फलन्ति—सक्रिय, कारगर; ओषधय:—दवाएँ; सर्वा:—समस्त; कामम्—आवश्यकताएँ; अन्वृतु—मौसमी; तस्य—राजा के लिए; वै— निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक ऋतु में नदियाँ, समुद्र, पर्वत, जंगल, लताएँ तथा कारगर औषधियाँ प्रचुर मात्रा में राजा को अपना-अपना कर चुकता करती थीं।
 
तात्पर्य
 चूँकि महाराज युधिष्ठिर अजित के संरक्षण में थे, जैसाकि पहले उल्लेख हो चुका है, अतएव भगवान् की सम्पत्ति अर्थात् नदियाँ, समुद्र, पर्वत, जंगल आदि प्रसन्न थे और वे राजा को अपना-अपना कर चुकाते रहते थे। सफलता का रहस्य है भगवान् के संरक्षण में शरण लेना। उनकी अनुमति के बिना कुछ सम्भव नहीं है। औजारों तथा यंत्रो के बल पर अपने आप से आर्थिक विकास करने के लिए प्रयास करना ही तो सब कुछ नहीं है। उसके लिए परमेश्वर की अनुमति होनी आवश्यक है, अन्यथा सारी यांत्रिक व्यवस्था होने पर भी सब कुछ विफल रहेगा। सफलता का अन्तिम कारण दैव या परमेश्वर है। महाराज युधिष्ठिर जैसे राजा यह अच्छी तरह जानते थे कि राजा जनता के कल्याण कार्यों की देखभाल करनेवाला परमेश्वर का दूत होता है। वस्तुत: राज्य परमेश्वर की सम्पत्ति है। नदियाँ, समुद्र, जंगल, पर्वत, औषधियाँ इत्यादि मनुष्य की सृष्टियाँ नहीं हैं। ये सब परमेश्वर की सृष्टियाँ हैं और जीव को भगवान् की इस सम्पत्ति का उपयोग करने की अनुमति भगवान् की सेवा करने के लिए दी जाती है। आज का नारा यह है कि प्रत्येक वस्तु जनता के लिए है, अतएव सरकार जनता द्वारा, जनता के लिए है। लेकिन इस समय ईश्वर- चेतना तथा मानव जीवन की पूर्णता के आधार पर नई तरह की मानवता, अर्थात् ईश्वरीय साम्यवाद की विचारधारा उत्पन्न करने के लिए संसार को महाराज युधिष्ठिर अथवा परीक्षित जैसे राजाओं के पदचिह्नों का अनुसरण करना होगा। परमेश्वर की इच्छा से प्रत्येक वस्तु की प्रचुरता है और हम इन वस्तुओं का उपभोग मनुष्य तथा मनुष्य के बीच, पशु तथा मनुष्य या प्रकृति के बीच, शत्रु भाव से रहित होकर सुखपूर्वक रहने के लिए कर सकते हैं। भगवान् का नियंत्रण सर्वत्र है और यदि भगवान् प्रसन्न हो जाँय, तो प्रकृति का कोना-कोना पुलकित हो जाए। तब नदियाँ उमडक़र भूमि को उर्वर बनाएँगी, समुद्र प्रचुर मात्रा में खनिज, मोती तथा रत्न प्रदान करेंगे, जंगल पर्याप्त ईंधन, औषधियाँ तथा वनस्पतियों की पूर्ति करेंगे और ऋतु-परिवर्तन से विपुल मात्रा में फल-फूल मिल सकेंगे। फैक्टरियों तथा औजारों पर आश्रित रहकर जीने की कृत्रिम शैली से, कुछ ही व्यक्तियों को, तथाकथित सुख प्राप्त हो सकेगा, और वह भी लाखों लोगों का सुख छीनकर। चूँकि जन समूह की शक्ति फैक्टरी उत्पादन में लगी है, अतएव प्राकृतिक पदार्थों में गतिरोध आ रहा है और जन-समूह दुखी है। ठीक से शिक्षा पाये बिना, अधिकांश लोग प्राकृतिक भंडारों का दोहन करके स्वार्थी हेतु के पीछे-पीछे चले जा रहे हैं, अतएव व्यक्ति-व्यक्ति तथा राष्ट्र-राष्ट्र के बीच कड़ी स्पर्धा चल रही है। भगवान् के प्रशिक्षित दूत द्वारा नियन्त्रण नहीं हो रहा है। हमें यहीं पर तुलना करके आधुनिक सभ्यता के दोषों पर विचार करना चाहिए और मनुष्य को शुद्ध करने तथा कालदोष को मिटाने के लिए महाराज युधिष्ठिर के पदचिह्नों पर चलना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥