श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
आमन्‍त्र्य चाभ्यनुज्ञात: परिष्वज्याभिवाद्य तम् ।
आरुरोह रथं कैश्चित्परिष्वक्तोऽभिवादित: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
आमन्त्र्य—अनुमति लेकर; च—तथा; अभ्यनुज्ञात:—आज्ञा पाकर; परिष्वज्य—आलिंगन करके; अभिवाद्य—चरणों पर झुककर; तम्—महाराज युधिष्ठिर को; आरुरोह—आरूढ़ हुए; रथम्—रथ में; कैश्चित्—किन्हीं के द्वारा; परिष्वक्त:— आलिंगित होकर; अभिवादित:—अभिवादन किया जाकर ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् जब भगवान् ने प्रस्थान करने की अनुमति माँगी और राजा ने अनुमति दे दी तो भगवान् ने महाराज युधिष्ठिर के चरणों में नतमस्तक होकर प्रणाम किया और राजा ने उनको गले लगा लिया। इसके बाद अन्यों द्वारा गले मिलने एवं नमस्कृत होकर, वे अपने रथ में आरूढ़ हुए।
 
तात्पर्य
 महाराज युधिष्ठिर भगवान् कृष्ण के बड़े फुफेरे भाई थे, अतएव उनसे विदा होते समय, भगवान् राजा के चरणों में नतमस्तक हुए। राजा ने छोटे भाई की तरह उनका आलिंगन किया, यद्यपि राजा भलीभाँति जानते थे कि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। भगवान् को प्रसन्नता होती है जब उनका कोई भक्त उन्हें प्रेम में, अपने से घटकर समझता है। भगवान् से बढक़र या उनके समान अन्य कोई भी नहीं है, तो भी वे अपने भक्तों द्वारा छोटा समझे जाने पर प्रसन्न होते हैं। ये सब भगवान् की दिव्य लीलाएँ हैं। निर्विशेषवादी भगवद्भक्त के द्वारा निभाई जाने-वाली अलौकिक भूमिका को समझ नहीं सकते। तत्पश्चात् भीम तथा अर्जुन भगवान् को गले मिले, क्योंकि वे समवयस्क थे, लेकिन नकुल तथा सहदेव ने उन्हें प्रणाम किया, क्योंकि वे उनसे छोटे थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥