श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
कथं वयं नाथ चिरोषिते त्वयि प्रसन्नद‍ृष्टय‍ाखिलतापशोषणम ।
जीवेम ते सुन्दरहासशोभितमपश्यमाना वदनं मनोहरम ।
इति चोदीरिता वाच: प्रजानां भक्तवत्सल ।
श‍ृण्वानोऽनुग्रहं द‍ृष्टय‍ा वितन्वन् प्राविशत् पुरम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
कथम्—कैसे; वयम्—हम; नाथ—हे प्रभु; चिरोषिते—सदैव बाहर रहने के कारण; त्वयि—आपके द्वारा; प्रसन्न—प्रसन्नता; दृष्ट्या—झलक से; अखिल—संसार भर का; ताप—दुख; शोषणम्—नष्ट करने के लिए; जीवेम—जीवित रह सकें; ते— आपका; सुन्दर—सुन्दर; हास—हँसता हुआ; शोभितम्—अलंकृत; अपश्यमाना:—बिना देखे; वदनम्—मुख; मनोहरम्— आकर्षक; इति—इस प्रकार; च—तथा; उदीरिता:—बोलते हुए; वाच:—शब्द; प्रजानाम्—नागरिकों का; भक्त-वत्सल:— भक्तों के प्रति दयालु; शृण्वान:—ऐसा जानकर; अनुग्रहम्—दया; दृष्ट्या—चितवन से; वितन्वन्—वितरित करते हुए; प्राविशत्—प्रवेश किया; पुरम्—द्वारका में ।.
 
अनुवाद
 
 हे स्वामी, यदि आप सारे समय बाहर रहते हैं, तो हम आपके उस मनोहर मुखमण्डल को नहीं देख पाते, जिसकी मुसकान हमारे सारे कष्टों को दूर कर देती है। भला हम आपके बिना कैसे रह सकते हैं?
उनकी वाणी सुनकर, प्रजा तथा भक्तों पर अत्यन्त दयालु भगवान् ने द्वारकापुरी में प्रवेश किया और उन सबों पर अपनी दिव्य दृष्टि डालते हुए उनका अभिनन्दन स्वीकार किया।
 
तात्पर्य
 कृष्ण का आकर्षण इतना प्रबल होता है कि एक बार उनसे आकृष्ट हो जाने पर, उनका विछोह सह पाना कठिन हो जाता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि हम उनसे उसी तरह शाश्वत रूप से सम्बन्धित हैं, जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य-मण्डल से सम्बन्धित होती हैं। सूर्य की किरणें सौर विकिरण के आण्विक अंश हैं। इस तरह सूर्य तथा सूर्यप्रकाश को विलग नहीं किया जा सकता। बादलों द्वारा उनका विलगाव क्षणिक तथा कृत्रिम होता है और ज्योंही बादल हट जाते हैं, त्योंही सूर्य की किरणें सूर्य की उपस्थिति में अपना सहज तेज बिखेरने लगती हैं। इसी प्रकार, सारे जीव जो पूर्ण आत्मा के सूक्ष्मांश हैं, वे भ्रामक शक्ति माया के कृत्रिम आवरण के कारण भगवान् से विलग हैं। भ्रामक शक्ति माया के इस आवरण को हटाना है और ऐसा हो जाने पर, जीव भगवान् को साक्षात् देख सकते हैं और उनके सारे कष्ट तुरन्त ही दूर हो जाएँगे। हममें से प्रत्येक व्यक्ति जीवन के कष्टों को हटाना चाहता है, लेकिन हम जानते नहीं कि इन्हें किस प्रकार हटाया जाय। यहाँ पर इसका समाधान दिया गया है और यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे आत्मसात् करें अथवा नहीं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥