श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 13

 
श्लोक
गोपुरद्वारमार्गेषु कृतकौतुकतोरणाम् ।
चित्रध्वजपताकाग्रैरन्त: प्रतिहतातपाम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
गोपुर—नगरी का सिंहद्वार; द्वार—दरवाजा; मार्गेषु—विभिन्न सडक़ों पर; कृत—किये गये; कौतुक—उत्सव के कारण; तोरणाम्—सज्जित बन्दन-वार; चित्र—चित्रित; ध्वज—झंडियाँ; पताका-अग्रै:—अग्रणी चिह्नों द्वारा; अन्त:—भीतर; प्रतिहत—अवरुद्ध; आतपाम्—धूप को ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के स्वागतार्थ नगर का द्वार, घरों के दरवाजे तथा सडक़ों के किनारे झंडियों से सजे बन्दनवार बहुत ही सुन्दर ढंग से केले के वृक्षों तथा आम की पत्तियों जैसे मांगलिक प्रतीकों से सजाये गये थे। झंडियाँ, फूल-मालाएँ तथा चित्रित संकेत एवं लिखे गये सुवाक्य धूप को अवरुद्ध कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 विशेष उत्सवों की सजावट के लिए प्रतीक भी प्रकृति के उपहारों से—केले के वृक्षों, आम की वृक्षों, फूलों तथा फलों से लिए गए थे। आज भी आम्रवृक्ष, नारियल तथा कदली वृक्षों को मांगलिक प्रतीक माना जाता है। ऊपर जिन झंडियों
का उल्लेख हुआ है, उन सभी में भगवान् के इन दो महान् सेवक गरुड़ अथवा हनुमान के चित्र अंकित थे। अब भी ऐसे चित्र तथा अलंकरण भक्तों द्वारा पूजित हैं और भगवान् की तुष्टि के लिए सेवक को अधिक सम्मान प्रदान किया जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥