श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य ब्राह्मणै: ससुमङ्गलै: ।
शङ्खतूर्यनिनादेन ब्रह्मघोषेण चाद‍ृता: ।
प्रत्युज्जग्मू रथैर्हृष्टा: प्रणयागतसाध्वसा: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
वारण-इन्द्रम्—मांगलिक कार्यवाले हाथी को; पुरस्कृत्य—सामने करके; ब्राह्मणै:—ब्राह्मणों द्वारा; स-सुमङ्गलै:—समस्त शुभ लक्षणों सहित; शङ्ख—शंख; तूर्य—तुरही की; निनादेन—ध्वनि से; ब्रह्म-घोषेण—वेदों के स्तोत्रों के उच्चारण से; च—तथा; आदृता:—महिमा-मण्डित; प्रति—की ओर; उज्जग्मु:—तेजी में बढ़े; रथै:—रथ पर; हृष्टा:—आनन्द में; प्रणयागत—स्नेह से सिक्त; साध्वसा:—सादर ।.
 
अनुवाद
 
 वे फूल थामे हुए ब्राह्मणों समेत रथों पर भगवान् की ओर तेजी से बढ़े। उनके आगे-आगे सौभाग्य-के प्रतीक हाथी थे। शंख तथा तुरही बज रहे थे और वैदिक स्तोत्र उच्चरित हो रहे थे। इस प्रकार उन्होंने स्नेहसिक्त अभिवादन किया।
 
तात्पर्य
 किसी महापुरुष के स्वागत की वैदिक विधि से सम्मान का वातावरण उत्पन्न होता है, जो आगन्तुक के लिए स्नेह तथा सत्कार से पूर्ण होता है। ऐसे स्वागत का शुभ वातावरण उपर्युक्त साज सामग्री पर निर्भर करता है, जिसमें शंख, पुष्प, धूप, सजे हुए हाथी तथा वैदिक साहित्य से स्तोत्रों का पाठ करते हुए योग्य ब्राह्मण सम्मिलित हैं। स्वागत का ऐसा कार्यक्रम स्वागतकर्ता तथा स्वागत किए जाने वाले दोनों की निष्ठा से पूरित होता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥