श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
वारमुख्याश्च शतशो यानैस्तद्दर्शनोत्सुका: ।
लसत्कुण्डलनिर्भातकपोलवदनश्रिय: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
वारमुख्या:—विख्यात वेश्याएँ; च—तथा; शतश:—सैकड़ों; यानै:—सवारियों द्वारा; तत्-दर्शन—उनसे (भगवान् श्रीकृष्ण से) भेंट करने के लिए; उत्सुका:—अत्यन्त उत्सुक; लसत्—लटकते हुए; कुण्डल—कान के आभूषण; निर्भात—चमकते हुए; कपोल—ललाट; वदन—मुख; श्रिय:—सौन्दर्य ।.
 
अनुवाद
 
 उसी समय सैकड़ों विख्यात वेश्याएँ विविध सवारियों पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ चलीं। वे सभी भगवान् से मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक थीं और उनके सुन्दर मुख-मण्डल चमचमाते कुण्डलों से सुशोभित थे, जिनके कारण उनके ललाट की शोभा बढ़ रही थी।
 
तात्पर्य
 यदि वेश्याएँ भगवद्भक्त हों, तो हम उनसे भी घृणा नहीं कर सकते। आज भी भारत के बड़े-बड़े नगरों में ऐसी अनेक वेश्याएँ हैं, जो भगवान् की निष्ठावान् भक्त हैं। समय के फेर से, किसी को ऐसा पेशा ग्रहण करना पड़ जाता है, जो समाज में सम्मानित न हो, लेकिन इसके कारण भगवद्भक्ति करने में कोई व्यवधान नहीं आता। भगवान् की भक्ति समस्त परिस्थितियों में बेरोकटोक रहती है। इस वर्णन से ज्ञात होता है कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व, द्वारका जैसे नगर में भी, जहाँ श्रीकृष्ण निवास कर रहे थे, वेश्याएँ रहती थीं। इसका अर्थ यह है कि समाज के समुचित निर्वाह के लिए वेश्याएँ भी आवश्यक अंग हैं। सरकार शराब की दुकानें खोलने देती है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार मदिरापान को प्रोत्साहित करती है। भाव यह है कि लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जो किसी भी कीमत पर मदिरापान करेगा और ऐसा अनुभव है कि मद्य-निषेध से बड़े-बड़े शहरों में शराब की तस्करी को बढ़ावा मिला है। इसी प्रकार जो व्यक्ति घरों में सन्तुष्ट नहीं हो पाते हैं, उन्हें ऐसी छूट की अपेक्षा रहती है और यदि वेश्याएँ न हों, तो ऐसे निम्न लोग, दुसरों को वेश्यावृत्ति के लिए प्रेरित करेंगे। अच्छा हो कि वेश्याएँ बाजारों में उपलब्ध हों, जिससे समाज की पवित्रता कायम रहे। समाज के अन्दर वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन देने की अपेक्षा वेश्या-वर्ग को बनाये रखना अच्छा होगा। वास्तविक सुधार तो सभी लोगों को भगवद्-भक्त बनने के लिए प्रबुद्ध करना है, जिससे जीवन के समस्त पतनोन्मुख कारकों पर रोक लगेगी।

विष्णुस्वामी वैष्णव सम्प्रदाय के महान् आचार्य, श्री बिल्वमंगल ठाकुर, अपने गृहस्थ जीवन में एक वेश्या के प्रति अत्यधिक आसक्त थे, जो भगवान् की भक्त थी। एक रात जब घनघोर वर्षा हो रही थी तथा बिजली कडक़ रही थी, तो उसी में बिल्वमंगल ठाकुर चिन्तामणि के घर पहुँचे। वह आश्चर्यचकित थी कि ऐसी भयानक रात्रि में बाढ़ से उफनती नदी को पार करके ठाकुर कैसे आ गये। उसने बिल्वमंगल ठाकुर से कहा कि उस नगण्य स्त्री के हाड़-मांस के प्रति उनका जो आकर्षण है, यदि उसे भगवद्भक्ति में भगवान् की दिव्य सुन्दरता के प्रति लगाया जाता, तो अच्छा होता। यह ठाकुर के लिए परीक्षा की घड़ी थी और वे वेश्या के वचनों से आत्म-साक्षात्कार की ओर मुड़े। बाद में उन्होंने उस वेश्या को अपना गुरु माना और उन्होंने अपने काव्य में कई स्थलों पर चिन्तामणि के नाम का गुणगान किया है, जिसने उन्हें सही मार्ग दिखलाया।

भगवद्गीता (९.३२) में भगवान् कहते हैं, “हे पृथापुत्र! निम्नकुल में उत्पन्न चंडाल, नास्तिकों के वंश में उत्पन्न मनुष्य तथा वेश्याएँ तक भी, जीवन की पूर्णता प्राप्त करेंगी, यदि वे भगवान् की अनन्य भक्ति का आश्रय ग्रहण कर लें, क्योंकि भक्तिमय सेवा के मार्ग में नीच कुल में जन्म तथा वृत्ति अवरोधक नहीं हैं। यह मार्ग उन सबों के लिए खुला है, जो उसका अनुगमन करना चाहते हैं।”

ऐसा प्रतीत होता है कि द्वारका की वेश्याएँ जो भगवान् से मिलने के लिए इतनी उत्सुक थीं, उनकी अनन्य भक्त थीं और इस तरह भगवद्गीता के उपरोक्त वचन के अनुसार वे सभी मोक्ष के पथ पर थीं। अतएव समाज में जिस एकमात्र सुधार की आवश्यकता है, वह है सारे नागरिकों को भगवद्भक्त बनाना। इस तरह उनमें स्वर्ग के निवासियों के समस्त सद्गुण स्वत: आ जाएँगे। दूसरी ओर, जो अभक्त हैं उनमें एक भी सद्गुण नहीं होता हैं, भले ही भौतिक दृष्टि से वे कितने ही उन्नत क्यों न हों। अन्तर इतना ही है कि भगवद्भक्त मोक्ष के पथ पर होते हैं, लेकिन अभक्त भवबन्धन में अधिकाधिक उलझने के मार्ग पर होते हैं। सभ्यता की प्रगति की कसौटी यह है कि लोग मोक्ष के मार्ग के लिए शिक्षित हैं या नहीं और उस पर अग्रसर हैं या नहीं।

 
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