श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
स उच्चकाशे धवलोदरो दरो-
ऽप्युरुक्रमस्याधरशोणशोणिमा ।
दाध्मायमान: करकञ्जसम्पुटे
यथाब्जखण्डे कलहंस उत्स्वन: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; उच्चकाशे—स्वच्छ हो गया; धवल-उदर:—सफेद तथा बड़े पेटवाला; दर:—शंख; अपि—यद्यपि वह ऐसा है; उरुक्रमस्य—महान् साहसी का; अधरशोण—उनके होठों के दिव्य गुण से; शोणिमा—लाल हुआ; दाध्मायमान:—बजाया जाकर; कर-कञ्ज-सम्पुटे—कर-कमलों की हथेली द्वारा पकड़ा जाकर; यथा—जिस तरह; अब्ज-खण्डे—कमल-दण्डों से; कल-हंस:—सुन्दर हंस; उत्स्वन:—जोर से शब्द करता ।.
 
अनुवाद
 
 श्वेत तथा मोटे पेंदेवाला शंख, भगवान् के हाथों द्वारा पकड़ा जाकर तथा उनके द्वारा बजाया जाकर, ऐसा लग रहा था मानो उनके दिव्य होठों का स्पर्श करके लाल हो गया हो। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई श्वेत हंस लाल रंग के कमलदण्डों के बीच खेल रहा हो।
 
तात्पर्य
 भगवान् के होठों के स्पर्श से श्वेत शंख की लालिमा आध्यात्मिक महत्ता की सूचक है। भगवान् पूरे के पूरे आत्मा हैं और भौतिक पदार्थ इस आध्यात्मिक अस्तित्व का अज्ञान है। वस्तुत: आध्यात्मिक प्रकाश में पदार्थ नाम की कोई वस्तु नहीं है और परमेश्वर श्रीकृष्ण के स्पर्श मात्र से यह आध्यात्मिक अनुभूति तत्काल हो जाती है। भगवान् जगत के कण-कण में व्याप्त हैं और वे किसी में भी अपनी उपस्थिति प्रकट कर सकते हैं। भगवान् के प्रगाढ़ प्रेम तथा भक्तिमय सेवा से या दूसरे शब्दों में भगवान् के आध्यात्मिक स्पर्श से प्रत्येक वस्तु उसी तरह लाल हो जाती है, जिस प्रकार भगवान् के होठों में लगा शंख। परमहंस अर्थात् अत्यन्त बुद्धिमान पुरुष आध्यात्मिक आनन्दरूपी जल में कलहंस के समान है, जो भगवान् के चरणकमलों से नित्य अलंकृत होता रहता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥