श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 21

 
श्लोक
भगवांस्तत्र बन्धूनां पौराणामनुवर्तिनाम् ।
यथाविध्युपसङ्गम्य सर्वेषां मानमादधे ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान् श्रीकृष्ण; तत्र—उस स्थान पर; बन्धूनाम्—मित्रों के; पौराणाम्—नागरिकों के; अनुवर्तिनाम्—स्वागतार्थ आये लोगों का; यथा-विधि—यथायोग्य; उपसङ्गम्य—पास जाकर; सर्वेषाम्—हर एक के लिए; मानम्—सम्मान तथा आदर; आदधे—प्रदान किया ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्रीकृष्ण उनके निकट गये और उन्होंने अपने समस्त मित्रों, सम्बन्धियों, नागरिकों तथा उन समस्त लोगों को, जो उन्हें लेने तथा स्वागत करने के लिए आये थे, यथायोग्य सम्मान तथा आदर प्रदान किया।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् न तो निराकार हैं, न ऐसी निष्क्रिय वस्तु हैं, जो अपने भक्तों के भावों के साथ आदान-प्रदान करने में असमर्थ हों। यहाँ पर यथाविधि शब्द महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है “यथायोग्य”। वे अपने विभिन्न प्रकार के प्रशंसकों तथा भक्तों के साथ यथायोग्य आदान-प्रदान करते हैं। निस्सन्देह शुद्ध भक्त एक ही तरह के होते हैं, क्योंकि भगवान् के अतिरिक्त उनका कोई अन्य सेवा-पात्र नहीं होता, इसीलिए
भगवान् भी ऐसे शुद्ध भक्तों के साथ यथायोग्य आदान-प्रदान करते हैं अर्थात् वे अपने शुद्ध भक्तों के सारे कार्यों के प्रति सतर्क रहते हैं। जो लोग उन्हें निराकार कहते हैं, भगवान् भी उनके प्रति कोई व्यक्तिगत रुचि नहीं दिखाते। वे प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आध्यात्मिक चेतना के विकास के रूप में प्रसन्न करते हैं और ऐसे आदान-प्रदान का नमूना यहाँ पर विभिन्न स्वागत करनेवालों के द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥