श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 25

 
श्लोक
नित्यं निरीक्षमाणानां यदपि द्वारकौकसाम् ।
न वितृप्यन्ति हि द‍ृश: श्रियो धामाङ्गमच्युतम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
नित्यम्—नियमित रूप से, सदैव; निरीक्षमाणानाम्—उनको देखनेवालों का; यत्—यद्यपि; अपि—के होते हुए; द्वारका- ओकसाम्—द्वारका के निवासी; न—कभी नहीं; वितृप्यन्ति—तुष्ट होते हैं; हि—ठीक से; दृश:—दृश्य; श्रिय:—सौन्दर्य; धाम- अङ्गम्—शरीर रूपी आगार; अच्युतम्—अमोघ ।.
 
अनुवाद
 
 द्वारकावासी समस्त सौन्दर्य के आगार अच्युत भगवान् को नित्य निहारने के अभ्यस्त थे, फिर भी वे कभी तृप्त नहीं होते थे।
 
तात्पर्य
 जब द्वारका नगर की स्त्रियाँ अपने-अपने महलों की अटारियों पर चढ़ गईं, तो उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि इससे पूर्व, उन्होंने अच्युत भगवान् के सुन्दर शरीर को अनेक बार देखा था। इससे संकेत मिलता है कि उनके भगवद्दर्शन की इच्छा से स्त्रियाँ तृप्त नहीं हुई थीं। यदि कोई भौतिक वस्तु बारम्बार देखी जाती है, तो उसके प्रति तृप्ति के नियमानुसार, आकर्षण का कम होना स्वाभाविक है, लेकिन यह तृप्ति का नियम भौतिक वस्तुओं पर लागू होता है, आध्यात्मिक जगत में इसकी गुंजायश नहीं रहती। यहाँ पर अच्युत शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यद्यपि भगवान् ने कृपापूर्वक पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, किन्तु तो भी वे अच्युत हैं। सारे जीव च्युत अर्थात् पतनशील हैं, क्योंकि जब वे भौतिक जगत के संसर्ग में आते हैं, तो वे अपनी आध्यात्मिक पहचान खो देते है, जिसके
कारण उनका भौतिक शरीर जन्म, वृद्धि, रूपान्तर, परिस्थिति, क्षय तथा विनाश जैसे प्राकृतिक नियमों के अधीन रहता है। किन्तु भगवान् का शरीर ऐसा नहीं होता है। वे अपने वास्तविक रूप में अवतरित होते हैं और भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा कभी भी प्रभावित नहीं होते। उनका शरीर प्रत्येक सम्भावित वस्तु का स्रोत है और अनुभवातीत समस्त शोभा का आगार है। अतएव भगवान् के दिव्य शरीर का दर्शन करके किसी को भी तृप्ति नहीं होती, क्योंकि उसमें नित्य नवीन सौन्दर्य दृष्टिगत होता रहता है। दिव्य नाम, रूप, गुण, पार्षद इत्यादि सभी आध्यात्मिक अभिव्यक्तियाँ हैं और भगवान् के पवित्र नाम का नाम- कीर्तन करने तथा उनके गुणों का कथन करने में कभी तृप्ति नहीं होती और न भगवान् के पार्षदों की ही कोई सीमा है। वे सबों के स्रोत हैं और असीम हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥