श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
प्रविष्टस्तु गृहं पित्रो: परिष्वक्त: स्वमातृभि: ।
ववन्दे शिरसा सप्त देवकीप्रमुखा मुदा ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
प्रविष्ट:—प्रवेश करने पर; तु—लेकिन; गृहम्—घर में; पित्रो:—पिता के; परिष्वक्त:—आलिंगित होकर; स्व-मातृभि:—अपनी माताओं द्वारा; ववन्दे—नमस्कार किया; शिरसा—सिर से; सप्त—सात; देवकी—देवकी; प्रमुखा—इत्यादि; मुदा— प्रसन्नतापूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पिता के घर में प्रवेश करने पर उन्हें उनकी माताओं ने गले लगाया और भगवान् ने उनके चरणों पर अपना शिर रखकर उन्हें नमस्कार किया। माताओं में देवकी (उनकी असली माता) प्रमुख थीं।
 
तात्पर्य
 ऐसा लगता है कि भगवान् कृष्ण के पिता वसुदेव का अपना अलग से आवास था, जहाँ वे अपनी अठारह रानियों समेत रहते थे, जिनमें से श्रीमती देवकी कृष्ण की असली माता हैं। लेकिन इतने पर भी, अन्य सौतेली माताएँ उन्हें समान रूप से प्यार करती थीं, जैसाकि अगले श्लोक से पता चल जाएगा। भगवान् कृष्ण भी अपनी असली माता तथा विमाताओं में कोई भेदभाव नहीं करते थे और उन्होंने उस अवसर पर उपस्थित वसुदेव की समस्त पत्नियों को नमस्कार किया। शास्त्रों के अनुसार भी सात प्रकार की माताएँ होती हैं—(१) वास्तविक माता, (२) गुरु-पत्नी, (३) ब्राह्मण पत्नी, (४) राजा की पत्नी, (५) गाय, (६) धाय तथा (७) पृथ्वी। ये सभी माताएँ हैं। शास्त्रों के इस आदेश से भी विमाता, जो पिता की पत्नी होती है, माता के तुल्य होती है, क्योंकि पिता गुरु भी होता है। ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् कृष्ण अन्यों को विमाताओं के साथ व्यवहार करने की शिक्षा देने के लिए एक आदर्श पुत्र की भूमिका निभाते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥