श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
ता: पुत्रमङ्कमारोप्य स्‍नेहस्‍नुतपयोधरा: ।
हर्षविह्वलितात्मान: सिषिचुर्नेत्रजैर्जलै: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
ता:—वे सभी; पुत्रम्—पुत्र को; अङ्कम्—गोद में; आरोप्य—बिठाकर; स्नेह-स्नुत—स्नेह से सिक्त; पयोधरा:—वक्षस्थल; हर्ष—प्रसन्नता; विह्वलित-आत्मान:—से विभोर; सिषिचु:—नम; नेत्रजै:—आँखों के; जलै:—जल से ।.
 
अनुवाद
 
 माताओं ने अपने पुत्र को गले लगाने के बाद, उसे अपनी-अपनी गोद में बिठाया। विशुद्ध स्नेह के कारण उनके स्तनों से दूध निकल आया। वे हर्ष से विभोर हो गईं और उनके नेत्रों के अश्रुओं से भगवान् भीग गये।
 
तात्पर्य
 जब भगवान् कृष्ण वृन्दावन में थे, तो गौंवे भी उनके प्रति स्नेहिल हो उठती थीं और वे उनके थनों से दूध दुह लिया करते थे। तो उनकी विमाताओं का क्या कहना, जो उनकी माता तुल्य ही थीं?
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥