श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तमुपश्रुत्य निनदं जगद्भयभयावहम् ।
प्रत्युद्ययु: प्रजा: सर्वा भर्तृदर्शनलालसा: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस; उपश्रुत्य—सुनकर; निनदम्—शब्द को; जगत्-भय—भौतिक संसार का भय; भय-आवहम्—भयभीत बनानेवाला तत्त्व; प्रति—की ओर; उद्ययु:—तेजी से आगे बढ़े; प्रजा:—नागरिक; सर्वा:—सभी; भर्तृ—रक्षक; दर्शन—दर्शन की; लालसा:—इच्छा वाले ।.
 
अनुवाद
 
 भौतिक जगत में साक्षात् भय को भी भयभीत बनानेवाले, उस शब्द को सुनकर द्वारका के नागरिक उनकी ओर तेजी से दौडऩे लगे, जिससे वे भक्तों के रक्षक भगवान् का चिर अभिलषित दर्शन कर सकें।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले कहा जा चुका है, भगवान् कृष्ण के समय द्वारका में जो नागरिक रह रहे थे, वे सभी मुक्त जीव थे, जो भगवान् के साथ उनके पाषदों के रूप में अवतरित हुए थे। वे सभी भगवान् के दर्शन के लिए लालायित थे, यद्यपि आध्यात्मिक स्पर्श के कारण वे उनसे कभी विलग न थे। जिस प्रकार वृन्दावन की गोपियाँ भगवान् कृष्ण के गो-चारण के समय उनके गाँव से दूर जाने पर सदैव उनके विषय में सोचती रहती थीं, उसी प्रकार द्वारका के नागरिक भी द्वारका से दूर कुरुक्षेत्र युद्ध में भाग लेने के लिए गये हुए कृष्ण के विचारों में तल्लीन रहते थे। बंगाल के कुछ सुप्रसिद्ध कथा लेखकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका के कृष्ण भिन्न-भिन्न व्यक्ति थे, किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से इस निष्कर्ष में कोई सचाई नहीं है। कुरुक्षेत्र के कृष्ण तथा द्वारका के कृष्ण एक ही व्यक्ति हैं।

द्वारका के नागरिक दिव्य नगरी से भगवान् कृष्ण की अनुपस्थिति के कारण, उसी प्रकार शोकाकुल थे, जिस प्रकार रात्रि में सूर्य की अनुपस्थिति के कारण हम सब उद्विग्न हो उठते हैं। भगवान् कृष्ण द्वारा की गयी ध्वनि, प्रभात के समय सूर्योदय जैसी थी। अतएव द्वारका के सारे वासी निद्रा जौसी अवस्था से जाग गये, क्योंकि कृष्णरूपी सूर्य का उदय हो चुका था और वे सब उनका दर्शन पाने के लिए फुर्ती से उनकी ओर आगे बढ़े। भगवद्भक्त भगवान् के सिवा अन्य किसी को अपना रक्षक नहीं मानते।

भगवान् का यह शब्द भगवान् से अभिन्न है, जैसाकि हम भगवान् की द्वंद्वरहित स्थिति की व्याख्या करते समय बता चुके हैं। हमारी वर्तमान भौतिक स्थिति भय से ओत-प्रोत है। आहार, आश्रय, भय तथा मैथुन—भौतिक अवस्था की इन चार समस्याओं में से भय की समस्या हमें सबसे अधिक कष्ट पहुँचाने वाली है। हम अगली समस्या को न जानने के कारण सदैव भयभीत रहते हैं। यह सारा भौतिक जगत समस्याओं से भरा पड़ा है, अतएव भय की समस्या सर्व-प्रमुख रहती है। इसका कारण भगवान् की भ्रामक शक्ति के साथ हमारा सान्निध्य है, जो माया अथवा बहिरंगा शक्ति के रूप में जानी जाती है। फिर भी जैसे ही भगवान् की ध्वनि होती है—जिसका प्रतिनिधित्व उनके पवित्र नाम द्वारा किया जाता है—वैसे ही सारा भय तत्काल दूर हो जाता है। भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने निम्नलिखित सोलह शब्दों द्वारा इसे उच्चरित की थी : हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

हम इन शब्दों का लाभ उठा सकते हैं और संसार की भयावह समस्याओं से उबर सकते हैं।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥