श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
पत्न्य: पतिं प्रोष्य गृहानुपागतं
विलोक्य सञ्जातमनोमहोत्सवा: ।
उत्तस्थुरारात् सहसासनाशयात्
साकं व्रतैर्व्रीडितलोचनानना: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
पत्न्य:—पत्नियाँ (भगवान् कृष्ण की); पतिम्—पति को; प्रोष्य—घर से दूर गया हुआ; गृह-अनुपागतम्—अब घर लौटा हुआ; विलोक्य—देखकर; सञ्जात—उत्पन्न करके; मन:-महा-उत्सवा:—मन के भीतर प्रसन्नतापूर्ण उत्सव का भाव; उत्तस्थु:—उठीं; आरात्—दूर से; सहसा—एकाएक; आसना—आसनों से; आशयात्—ध्यान अवस्था से; साकम्—के साथ; व्रतै:—व्रत के; व्रीडित—लज्जा से देखते; लोचन—नेत्र; आनना:—मुख ।.
 
अनुवाद
 
 दीर्घकाल तक बाहर रहने के बाद अपने पति को घर आया देखकर श्रीकृष्ण की रानियाँ मन ही मन अत्यन्त हर्षित हुईं। वे अपने-अपने आसनों तथा ध्यानों से तुरन्त उठकर खड़ी हो गईं। सामाजिक प्रथा के अनुकूल, उन्होंने लज्जा से अपने मुख ढक लिये और दृष्टि नीची किये देखने लगीं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि ऊपर कहा गया है भगवान् अपनी १६,१०८ रानियों के महलों में प्रविष्ट हुए। इसका अर्थ यह है कि भगवान् ने तुरन्त ही अपना विस्तार उतने अंशों में कर लिया, जितनी रानियाँ तथा महल थे और उन सबों में एकसाथ पृथक्-पृथक् प्रविष्ट हुए। यहाँ पर उनकी अन्तरंगा शक्ति की अन्य अभिव्यक्ति हुई है। वे इच्छानुसार अनेक आध्यात्मिक स्वरूपों में अपना विस्तार कर सकते हैं, यद्यपि वे अद्वितीय हैं। श्रुति मंत्र से प्रतिपादित होता है कि परम पूर्ण एक हैं, किन्तु इच्छानुसार वे अनेक बन जाते हैं। परमेश्वर के ये अनेक विस्तार पूर्ण तथा भिन्नांशों के रूप में होते हैं। भिन्नांश उनकी शक्ति के द्योतक हैं और पूर्णांश उनके व्यक्तित्व की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस तरह भगवान् ने अपने १६,१०८ पूर्ण अंश प्रकट किये और प्रत्येक रानी के महल में एक ही साथ प्रविष्ट हुए। इसे वैभव या भगवान् की दिव्य शक्ति कहा जाता है। चूँकि वे ऐसा कर सकते हैं, अतएव वे योगेश्वर भी कहलाते हैं। सामान्यतया कोई योगी अपना अधिक से अधिक दस गुना विस्तार कर सकता है, लेकिन भगवान् इच्छानुसार कई हजार गुना या अनन्त विस्तार कर सकते हैं। अश्रद्धालु लोग यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि कृष्ण ने १६,००० से अधिक रानियों से विवाह किया, क्योंकि वे उन्हें अपने ही समान एक मान कर, अपनी सीमित शक्ति से उनकी शक्ति की तुलना करते हैं। अतएव मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि भगवान् कभी भी जीवों के स्तर पर नहीं होते। जीव उनकी तटस्था शक्ति के विस्तार मात्र हैं। मनुष्य को कभी सोचना भी नहीं चाहिए कि शक्तिमान तथा शक्ति समान होते हैं, यद्यपि शक्ति तथा शक्तिमान में गुण का केवल रंचमात्र अन्तर है। रानियाँ भी उनकी अन्तरंगा शक्ति की विस्तार थीं और इस तरह शक्ति तथा शक्तिमान निरन्तर दिव्य आनन्द का आदान-प्रदान करते हैं। इन्हें ही भगवान् की लीलाएँ कहते हैं। अतएव किसी को यह जानकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि भगवान् की इतनी सारी पत्नियाँ थीं। उल्टे, लोगों को यह मानना चाहिए कि यदि भगवान् के लाखों-करोड़ों पत्नियाँ होतीं, तो भी वे अपनी असीम तथा अक्षय शक्ति को पूरी तरह प्रकट नहीं कर रहे। उन्होंने केवल १६,००० पत्नियों से ब्याह किया और उनमें से प्रत्येक के महल में यह दिखाने के लिए प्रवेश किया कि इस पृथ्वी पर कोई मनुष्य कितना ही बलवान क्यों न हो, वह न तो उनकी समता कर सकता है, न उनसे बढक़र है। अतएव न तो कोई उनके समान है, न उनसे बढक़र है। भगवान् सभी मामलों में सदा महान् हैं। शाश्वत सत्य भी यही है कि, “ईश्वर महान् हैं।”

अतएव कुरुक्षेत्र के युद्ध के कारण दीर्धकाल तक घर से दूर रहनेवाले अपने पति को ज्योंही रानियों ने कुछ दूरी पर देखा, तो वे ध्यान की निद्रा से जग गईं और अपने प्रियतम की अगवानी के लिए तैयार हो गईं। याज्ञवल्क्य के धार्मिक आदेशानुसार जिस स्त्री का पति घर से बाहर हो, उसे न तो किसी सामाजिक उत्सव में भाग लेना चाहिए, न शरीर को अलंकृत करना चाहिए, न हँसना चाहिए और न किसी भी परिस्थति में अपने सम्बन्धी के घर जाना चाहिए। जिन स्त्रियों के पति बाहर हों, उनके लिए यही व्रत है। लेकिन साथ ही साथ यह भी कहा गया है कि पत्नी कभी भी अपने पति के समक्ष मलिन अवस्था में उपस्थित न हो। वह अपने आपको आभूषणों से अलंकृत करे और अच्छे वस्त्र पहने और पति के समक्ष सदैव प्रसन्न तथा हर्षित मुद्रा में जाए। कृष्ण की सारी रानियाँ पति की अनुपस्थिति का चिन्तन करते हुए ध्यान-मग्न थीं और निरन्तर उन्हीं का ध्यान करती रहती थीं। भगवान् के भक्त भगवान् के ध्यान के बिना पल भर भी नहीं रह सकते, तो फिर रानियों के लिए क्या कहा जाय, जो द्वारका में भगवान् की लीलाओं में रानी के रूप में अवतरित हुई लक्ष्मीयाँ थीं। वे भगवान् की उपस्थिति द्वारा या समाधि द्वारा उनसे कभी विलग नहीं की जा सकतीं। वृन्दावन की गोपियाँ जब भगवान् वन में गाएँ चराने के लिए बाहर जाते थे, तो भगवान् को भुला नहीं पाती थीं। जब बाल-रूप भगवान् कृष्ण गाँव में नहीं होते थे, तो घर पर गोपियाँ, नरम चरणकमलों से कठोर भूमि पर चलते हुए कृष्ण के बारे में चिन्ता करती रहतीं। कभी-कभी इस तरह चिन्तन करते-करते वे समाधि में पहुँच जातीं और हृदय में सन्ताप करतीं। भगवान् के शुद्ध पार्षदों की ऐसी ही दशा होती है। वे सदैव समाधि में रहते हैं। अतएव कृष्ण की अनुपस्थिति में रानियाँ भी समाधिस्थ थीं। इस समय, भगवान् को कुछ दूरी पर देखकर, उन्होंने अपने सारे कार्य छोड़ दिये, जिनमें उपर्युक्त स्त्रियों के व्रत भी सम्मिलित थे। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के मतानुसार इस अवसर पर नियमित मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया हुई। पहले तो वे सभी अपने-अपने आसनों से उठ गईं, क्योंकि अपने-अपने पति को देखना चाहती थीं, किन्तु स्त्री योचित लज्जा के कारण वे रुक गईं, लेकिन प्रबल उत्कंठा के कारण उन्होंने इस दुर्बलता की अवस्था पर काबू पा लिया और भगवान् का आलिंगन करने की भावना से अभिभूत हो गईं और इस विचार ने उन्हें अपने आस-पास के परिवेश से अचेत बना दिया। इस उत्कंठा की मूल दशा के कारण सारी औपचारिकताओं एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का अन्त हो गया और इस तरह भगवान् के मिलन-पथ के सारे अवरोध दूर हो गये। आत्मा के प्रभु, श्रीकृष्ण के मिलन की यह चरम अवस्था है।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥