श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
तमयं मन्यते लोको ह्यसङ्गमपि सङ्गिनम् ।
आत्मौपम्येन मनुजं व्यापृण्वानं यतोऽबुध: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—भगवान् कृष्ण को; अयम्—ये सब (सामान्य लोग); मन्यते—मन में सोचते हैं; लोक:—बद्धजीव; हि—निश्चय ही; असङ्गम्—अनासक्त; अपि—के होते हुए; सङ्गिनम्—प्रभावित; आत्म—स्वयं; औपम्येन—अपने साथ तुलना करके; मनुजम्— सामान्य मनुष्य; व्यापृण्वानम्—लगे रहकर; यत:—क्योंकि; अबुध:—अज्ञान के कारण मूर्ख ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्य भौतिकतावादी बद्धजीव सोचते रहते हैं कि भगवान् उन्हीं में से एक हैं। अपने अज्ञान के कारण वे सोचते हैं कि पदार्थ का भगवान् पर प्रभाव पड़ता है, भले ही वे अनासक्त रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर अबुध: शब्द महत्त्वपूर्ण है। केवल अज्ञानवश, मूर्ख संसारी विवादक परमेश्वर को गलत समझते हैं और अबोध लोगों में प्रचार करके अपने मूर्खतापूर्ण विचारों को फैलाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं और जब वे साक्षात् सबों के समक्ष विद्यमान थे, तब उन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पूर्ण दिव्य शक्ति का प्रदर्शन किया था। जैसाकि हम श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक में ही स्पष्ट कर चुके हैं, भगवान् अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं, किन्तु उनके सारे कार्य शाश्वतता, ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण होते हैं। केवल मूर्ख भौतिकतावादी उनके ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण शाश्वत रूप को न जानते हुए उन्हें गलत तरीके से समझते हैं, यद्यपि इसकी पुष्टि भगवद्गीता एवं उपनिषदों में हुइ है। उनकी विविध शक्तियाँ पूर्णतया प्राकृतिक क्रम के अनुसार कार्य करती हैं और अपनी विभिन्न शक्तियों के माध्यम से सारे कार्य करते हुए वे निरन्तर परम स्वतंत्र रहते हैं। जब वे विभिन्न जीवों पर अपनी अहैतुकी कृपा करके भौतिक संसार में अवतरित होते हैं, तब वे अपनी निजी शक्ति से ही ऐसा करते हैं। वे किसी तरह भी प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं होते और वे अपने मूल रूप में प्रकट होते हैं। मानसिक तर्कवादी उन्हें परम पुरुष के रूप में सही समझ नहीं पाते हैं और वे अव्यक्त ब्रह्मके निराकार पक्ष को ही सब कुछ मान लेते हैं। ऐसी धारणा बद्ध जीवन का ही परिणाम है, क्योंकि वे अपनी व्यक्तिगत क्षमता से आगे नहीं पहुँच पाते। अतएव जो भगवान् को अपनी सीमित शक्ति के स्तर पर समझता है, वह केवल सामान्य व्यक्ति होता है। ऐसे व्यक्ति को यह विश्वास कभी नहीं दिलाया जा सकता कि भगवान् प्रकृति के गुणों से किसी तरह प्रभावित नहीं होते। वह यह नहीं जान पाता कि सूर्य सदैव दूषित पदार्थ से अप्रभावित रहा करता है। मानसिक तर्कवादी सदैव अपने अनुभव के ज्ञान के आधार पर हर वस्तु को तोलते हैं। अत: जब भगवान् विवाह-बन्धन में सामान्य व्यक्ति की भाँति कर्म करते पाये जाते हैं, तो वे उन्हें अपने समान समझने लगते हैं और यह विचार नहीं करते कि भगवान् एकसाथ सोलह हजार या इससे भी अधिक पत्नियाँ से विवाह कर सकते हैं। अल्पज्ञान के कारण, वे चित्र के एक पक्ष को देखते हैं और दूसरे पक्ष पर अविश्वास दिखाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अज्ञानवश ही वे कृष्ण को अपने समान मानते हैं और अपने निष्कर्ष निकालते हैं, जो श्रीमद्भागवत के मतानुसार निरर्थक तथा अप्रामाणिक होते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥