श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणै: ।
न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—यह; ईशनम्—दिव्यता, भगवत्ता; ईशस्य—भगवान् की; प्रकृति-स्थ:—प्रकृति के सम्पर्क में रहकर; अपि—भी; तत्- गुणै:—गुणों के द्वारा; न—कभी नहीं; युज्यते—प्रभावित होता है; सदा आत्म-स्थै:—शाश्वतता में स्थित रहनेवालों के द्वारा; यथा—जैसा है; बुद्धि:—बुद्धि; तत्—भगवान्; आश्रया—शरणागत ।.
 
अनुवाद
 
 यह तो भगवान् की अलौकिकता है कि वे भौतिक प्रकृति के गुणों के संसर्ग में रहते हुए भी उनसे प्रभावित नहीं होते। इसी प्रकार जिन भक्तों ने भगवान् की शरण ग्रहण कर ली है, वे भी भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं होते।
 
तात्पर्य
 वेदों तथा वैदिक ग्रंथों (श्रुति तथा स्मृति) में पुष्टि की गई है कि दिव्यता में लेशमात्र भौतिकता नहीं होती। भगवान् दिव्य (निर्गुण) ही होते हैं—परम ज्ञानमय होते हैं। हरि या भगवान् परम दिव्य पुरुष हैं, जो भौतिक प्रभाव की परिधि के बाहर स्थित होते हैं। इन तथ्यों की पुष्टि आचार्य शंकर द्वारा भी हुई है। कोई यह तर्क कर सकता है कि लक्ष्मीदेवी के साथ उनका सम्बन्ध दिव्य हो सकता है, लेकिन जिस यदुवंश में वे उत्पन्न हुए थे, उसके साथ या जरासंध तथा भौतिक गुणों से लिप्त रहने वाले अन्य असुरों के साथ, उनका ऐसा सम्बन्ध कैसे हो सकता है? इसका उत्तर यही है कि किसी भी दशा में भगवान् की भगवत्ता (दिव्यता) कभी भी प्रकृति के गुणों के सम्पर्क में नहीं आती। वस्तुत: वे ऐसे गुणों के सम्पर्क में इसलिए लगते हैं, क्योंकि वे ही हर वस्तु के परम उद्गम हैं। तो भी वे ऐसे गुणकर्मों से ऊपर रहते हैं। इसीलिए वे योगेश्वर कहलाते हैं, अर्थात् दूसरे शब्दों में कहना चाहें तो वे सर्वशक्तिमान हैं। यहाँ तक कि उनके विद्वान भक्त भी भौतिक गुणों से प्रभावित नहीं होते। वृन्दावन के छ: महान् गोस्वामी अत्यन्त सम्पन्न एवं राजसी परिवारों के थे, किन्तु जब वे वृन्दावन में सन्त जीवन बिताने लगे, तो भले ही ऊपरी तौर से उनकी दशा दारुण रही हो, किन्तु वास्तव में वे आध्यात्मिक मूल्यों की दृष्टि से सर्वाधिक सुसम्पन्न थे। ऐसे महाभागवत अर्थात् प्रथम कोटी के भक्त मनुष्यों के बीच विचरण करते हुए भी, प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न मान या अपमान, भूख या तृप्ति, निद्रा या जागरण से कलुषित नहीं होते। इसी प्रकार उनमें से कुछ सांसारिक आचरण में रहकर भी उससे अप्रभावित बने रहते हैं। जब तक जीवन में ये उदासीनताएँ नहीं होतीं, तब तक कोई अध्यात्म में स्थित नहीं माना जाता। दिव्यता तथा भगवान् के पार्षद एक ही आध्यात्मिक धरातल पर रहते हैं और उनकी महिमा सदा ही योगमाया अर्थात् भगवान् की अन्तरंगा शक्ति के कर्म द्वारा पुनीत होती रहती है। भगवान् के भक्त सदैव दिव्य होते हैं, भले ही कभी-कभी उनके आचरण का पतन होता दिखता हो। भगवान् भगवद्गीता (९.३०) में बलपूर्वक घोषित करते हैं कि यदि पूर्व कल्मष के कारण कोई भक्त पतित हो भी जाय, तो भी उस भक्त को भगवद्भक्ति में पूर्ण रूप से प्रवृत्त रहने के कारण पूर्णतया दिव्य मानना चाहिए। भगवान् उसके द्वारा सेवा करते रहने के कारण उसकी सदैव रक्षा करते हैं, और उसकी पतित अवस्थाओं को आकस्मिक तथा क्षणिक मानना चाहिए। वे देखते ही देखते छूमन्तर हो जाएँगी।
 
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