श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 39

 
श्लोक
तं मेनिरेऽबला मूढा: स्त्रैणं चानुव्रतं रह: ।
अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—श्रीकृष्ण को; मेनिरे—मान बैठते हैं; अबला:—सुकुमार; मूढा:—सरलता के कारण; स्त्रैणम्—स्त्री के अधीन; च—भी; अनुव्रतम्—पालनकर्ता; रह:—एकान्त स्थान; अप्रमाण-विद:—महिमा से अनजान; भर्तु:—अपने पति की; ईश्वरम्—परम नियन्ता को; मतय:—मत; यथा—जैसे ।.
 
अनुवाद
 
 वे सरल तथा सुकोमल स्त्रियाँ सचमुच ही सोच बैठीं कि उनके प्रिय पति, भगवान् श्रीकृष्ण, उनसे आकर्षिथ हैं और उनके वशीभूत हैं। वे अपने पति की महिमाओं से उसी तरह अनजान थीं, जिस प्रकार नास्तिक लोग परम नियन्ता के रूप में भगवान् से अनजान रहते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य पत्नियाँ तक भगवान् की अगाध महिमा को पूर्णतया जानती न थीं। यह अज्ञान सांसारिक नहीं है, क्योंकि भगवान् तथा उनके नित्य पार्षदों के मध्य भावों के आदान-प्रदान में भगवान् की अन्तरंगा शक्ति का कुछ न कुछ हाथ रहता है। भगवान् पाँच प्रकार से दिव्य सम्बन्धों अर्थात् ईश्वर, स्वामी, मित्र, पुत्र, प्रेमी भाव का आदान-प्रदान करते हैं और इन प्रत्येक लीलाओं में वे पूर्णतया अपनी अन्तरंगा शक्ति योगमाया द्वारा क्रीड़ा करते हैं। वे गोपों से या अर्जुन जैसे मित्रों के साथ समान स्तर के सखा की भाँति क्रीड़ा करते हैं। माता यशोदा के सामने वे सचमुच के पुत्र के रूप में क्रीड़ा करते हैं। गोपियों के समक्ष वे असली प्रेमी के रूप में और द्वारका की रानियों के समक्ष साक्षात् पति-रूप में क्रीड़ा करते हैं। भगवान् के ऐसे भक्त कभी भी भगवान् को परमेश्वर के रूप में नहीं सोचते, अपितु सामान्य मित्र, प्रिय पुत्र, या प्रेमी या पति के रूप में सोचते हैं, जो हृदय और आत्मा को बहुत प्रिय हैं। भगवान् तथा उनके उन दिव्य भक्तों के मध्य यही सम्बन्ध होता है, जो चिन्मय आकाश में भगवान् के पार्षद के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ अनेक वैकुण्ठ लोक स्थित हैं। जब भगवान् अवतरित होते हैं, तो वे दिव्य जगत की पूरी तस्वीर दिखाने के लिए अपने पार्षदों सहित अवतरित होते हैं, जहाँ भगवान् की सृष्टि के ऊपर किसी
प्रकार का प्रभुत्व जताने का कोई नाम भी नहीं लेता और जहाँ भगवान् के प्रति शुद्ध प्रेम तथा भक्ति का ही प्राधान्य रहता है। ऐसे भगवद्-भक्त मुक्तात्मा होते हैं। वे बहिरंगा शक्ति के प्रभाव का निषेध करनेवाली तटस्था या अन्तरंगा शक्ति की पूर्ण अभिव्यक्ति होते हैं। भगवान् की अन्तरंगा शक्ति ने भगवान् कृष्ण की पत्नियों को भगवान् की अगाध महिमाओं को भुलवा दिया, जिससे आदान-प्रदान में कोई त्रुटि न रह जाये और वे यह मान बैठीं कि भगवान् उनके वश में रहनेवाले पति तथा सदैव एकान्त स्थान में उनके पीछे-पीछे जाने वाले पति हैं। दूसरे शब्दों में, भगवान् के निजी पार्षद तक भगवान् को भलीभाँति नहीं जान पाते, अतएव शोधार्थी लेखक अथवा मानसिक तर्कबाज भगवान् की दिव्य महिमाओं के विषय में भला क्या जान सकेंगे? मानसिक तर्कबाज विभिन्न मतों के विषय में अपने विचार प्रकट करते हैं—कि वे सृष्टि के कारण हैं, सृष्टि के अवयव-स्वरूप हैं या सृष्टि के भौतिक तथा सक्षम कारण हैं—किन्तु यह तो भगवान्-विषयक केवल अधूरा ज्ञान है। वास्तव में वे सामान्य मनुष्य की ही तरह अनजान रहते हैं। भगवान् को केवल भगवान् की कृपा से ही जाना जा सकता है, अन्य किसी साधन से नहीं। चूँकि अपनी पत्नियों के साथ भगवान् के सारे आचरण शुद्ध दिव्य प्रेम तथा भक्ति पर आधारित हैं, अतएव सारी पत्नियाँ किसी भौतिक कल्मषरहित दिव्य पद पर आसीन हैं।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के अन्तर्गत “भगवान् कृष्ण का द्वारका में प्रवेश” नामक ग्यारहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥