श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 4-5

 
श्लोक
तत्रोपनीतबलयो रवेर्दीपमिवाद‍ृता: ।
आत्मारामं पूर्णकामं निजलाभेन नित्यदा ॥ ४ ॥
प्रीत्युत्फुल्लमुखा: प्रोचुर्हर्षगद्गदया गिरा ।
पितरं सर्वसुहृदमवितारमिवार्भका: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—तत्पश्चात्; उपनीत—अर्पित करके; बलय:—भेंटें; रवे:—सूर्य तक; दीपम्—दीपक; इव—सदृश; आदृता:— आदरपूर्वक; आत्म-आरामम्—आत्म-निर्भर को; पूर्ण-कामम्—पूर्णतया संतुष्ट; निज-लाभेन—अपनी निजी शक्ति से; नित्य दा—निरन्तर पूर्ति करनेवाले; प्रीति—स्नेह; उत्फुल्ल-मुखा:—प्रसन्नमुख; प्रोचु:—कहा; हर्ष—प्रसन्न हुए; गद्गदया— आह्लादयुक्त; गिरा—वाणी; पितरम्—पिता को; सर्व—सारे; सुहृदम्—मित्रों को; अवितारम्—संरक्षक को; इव—सदृश; अर्भका:—बालक ।.
 
अनुवाद
 
 सारे नागरिक अपनी-अपनी भेंटें लिये हुए भगवान् के सम्मुख आये और उन्हें उन परम संतुष्ट तथा आत्म-निर्भर भगवान् को अर्पित किया, जो अपनी निजी शक्ति से अन्यों की आवश्यकताओं की निरन्तर पूर्ति करते रहते हैं। ये भेंटें सूर्य को दिये गये दीप-दान जैसी थीं। फिर भी सारे नागरिक भगवान् के स्वागत में ऐसी आह्लादमयी भाषा में बोलने लगे, मानो बच्चे अपने अभिभावक तथा पिता का स्वागत कर रहे हों।
 
तात्पर्य
 परम भगवान् को यहाँ पर आत्माराम कहा गया है। वे आत्म-निर्भर हैं और उन्हें अपने से आगे अन्यत्र सुख की खोज करने की आवश्यकता नहीं है। वे आत्मनिर्भर हैं, क्योंकि उनका दिव्य अस्तित्व ही पूर्ण आनन्दमय है। वे शाश्वत विद्यमान हैं; वे सर्वज्ञ हैं और सर्व-आनन्दमय हैं। अतएव, उन्हें किसी भेंट की आवश्यकता नहीं है, चाहे वह कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो। फिर भी वे सबों के शुभचिन्तक हैं, अत: यदि शुद्ध भक्तिमय सेवा में कोई उन्हें कुछ अर्पित करता है, तो वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता है, क्योंकि वस्तुएँ स्वयं उनकी ही शक्ति द्वारा उत्पन्न की जाती हैं। यहाँ पर उपमा दी गई है कि भगवान् को भेंट की जाने वाली वस्तुएँ सूर्यदेव की पूजा हेतु दीप-दान जैसी हैं। जो भी वस्तु प्रज्वलित एवं प्रकाशमय होती है, वह सूर्य की शक्ति का उद्भवन है, तो भी सूर्यदेव की पूजा करने के लिए दीप-दान आवश्यक है। सूर्य की पूजा करते समय पूजा करनेवाला उनसे कुछ न कुछ माँग करता है, लेकिन भगवान् की भक्ति करने पर दोनों ओर से कोई माँग किये जाने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो भगवान् और भक्त के बीच शुद्ध प्रेम तथा स्नेह का प्रतीक है।
भगवान् सभी जीवों के परम पिता हैं, अतएव जो लोग भगवान् के साथ इस जीवन्त सम्बन्ध से अवगत हैं, वे पिता से पुत्र की तरह माँग कर सकते हैं और पिता भी अपने आज्ञाकारी पुत्रों की माँग पूरी करते हुए बिना किसी सौदेबाजी के प्रसन्नता का अनुभव करता है। भगवान् कल्पवृक्ष के तुल्य हैं और उनसे कोई भी व्यक्ति उनकी अहैतुकी कृपा से कुछ भी प्राप्त कर सकता है। किन्तु परम पिता होने के कारण, भगवान् अपने शुद्ध भक्तों को कोई ऐसी वस्तु नहीं देत, जो भक्ति के मार्ग में बाधक हो। जो लोग भगवान् की भक्तिमय सेवा में लगे हैं, वे उनके दिव्य आकर्षण के द्वारा अनन्य भक्ति के पद तक उन्नति कर सकते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥