श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 6

 
श्लोक
नता: स्म ते नाथ सदाङ्‌घ्रिपङ्कजं
विरिञ्चवैरिञ्च्यसुरेन्द्रवन्दितम् ।
परायणं क्षेममिहेच्छतां परं
न यत्र काल: प्रभवेत् पर: प्रभु: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
नता: स्म—हम नतमस्तक हुए थे; ते—आपके समक्ष; नाथ—हे भगवान्; सदा—सदैव; अङ्घ्रि-पङ्कजम्—चरणकमल; विरिञ्च—ब्रह्मा, प्रथम जीव; वैरिञ्च्य—ब्रह्मा के पुत्र, यथा सनक तथा सनातन; सुर-इन्द्र—स्वर्ग का राजा; वन्दितम्—पूजित; परायणम्—सर्वोपरि; क्षेमम्—कुशल, कल्याण; इह—इस जीवन में; इच्छताम्—इच्छा करनेवाला; परम्—सर्वोच्च; न—कभी नहीं; यत्र—जहाँ; काल:—प्रबल काल; प्रभवेत्—अपना प्रभाव डाल सकता है; पर:—दिव्य; प्रभु:—परमेश्वर ।.
 
अनुवाद
 
 नागरिकों ने कहा : हे भगवन्, आप ब्रह्मा, चारों कुमार तथा स्वर्ग के राजा जैसे समस्त देवताओं द्वारा भी पूजित हैं। आप उन लोगों के परम आश्रय हैं, जो जीवन का सर्वोच्च लाभ उठाने के लिए इच्छुक हैं। आप परम दिव्य भगवान् हैं और प्रबल काल भी आप पर अपना प्रभाव नहीं दिखा सकता।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता, ब्रह्म-संहिता तथा अन्य प्रामाणिक वैदिक साहित्य से इस बात की पुष्टि होती है कि श्रीकृष्ण ही परम ईश्वर हैं। न तो कोई उनके समान है, न ही कोई उनसे बढक़र है और यही सारे शास्त्रों का निर्णय है। सारे जीव जो परमेश्वर के अंशस्वरूप हैं और उन पर आश्रित हैं, उन पर देश-काल का प्रभाव पड़ता है। सारे जीव
अधीनस्थ-ब्रह्म हैं और परमेश्वर परम अधिष्ठता हैं। जैसे ही इस सुस्पष्ट तथ्य को भूल जाते है, हम तत्काल मोहग्रस्त हो जाते हैं और तीनों तापों से उसी तरह ग्रस्त हो जाते हैं, जिस प्रकार किसी को सघन अंधकार में रखा गया हो। सजग जीव की विमल चेतना ईश- चेतना है, जिसके अन्तर्गत मनुष्य सदैव नतमस्तक हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥