श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
अहो सनाथा भवता स्म यद्वयं
त्रैविष्टपानामपि दूरदर्शनम् ।
प्रेमस्मितस्‍निग्धनिरीक्षणाननं
पश्येम रूपं तव सर्वसौभगम् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह, यह तो हमारा सौभाग्य है; स-नाथा:—स्वामी के संरक्षण में होना; भवता—आपके द्वारा; स्म—जैसे हम बन चुके हैं; यत् वयम्—जैसे कि हम हैं; त्रैविष्ट-पानाम्—देवताओं को; अपि—भी; दूर-दर्शनम्—बहुत कम दिखाई पड़ते हैं; प्रेम- स्मित—प्रेम से हँसता हुआ; स्निग्ध—स्नेहपूर्ण; निरीक्षण-आननम्—उस प्रकार से दिखनेवाला मुख; पश्येम—देखें; रूपम्— सौन्दर्य; तव—आपका; सर्व—सम्पूर्ण; सौभगम्—सौभाग्य ।.
 
अनुवाद
 
 अहो! यह तो हमारा सौभाग्य है कि आज पुन: आपकी उपस्थिति से हम आपके संरक्षण में आ गये, क्योंकि आप स्वर्ग के निवासियों के यहाँ भी कभी-कभी जाते हैं। आपके स्मितमुख को देख पाना हमारे लिए अब सम्भव हो सका है, जो स्निग्ध चितवन से पूर्ण है। अब हम आपके सर्व-सौभाग्यशाली दिव्य रूप का दर्शन कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 केवल शुद्ध भक्त ही भगवान् के नित्य साकार रूप का दर्शन कर सकते हैं। भगवान् कभी भी निराकार नहीं होते, अपितु वे भगवान् के सर्वोपरि परिपूर्ण व्यक्तित्व हैं, जिन्हें भक्तिमय सेवा के द्वारा साक्षात् देखा जा सकता है और जो स्वर्ग के निवासियों के लिए भी दुर्लभ हैं। जब ब्रह्माजी तथा अन्य देवता भगवान् कृष्ण के पूर्ण अंश भगवान् विष्णु से परामर्श लेना चाहते हैं, तो उन्हें क्षीरसागर के तट पर जाकर प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जहाँ भगवान् विष्णु श्वेतद्वीप में शयन कर रहे होते हैं। यह क्षीरसागर तथा श्वेतद्वीप ग्रह इस ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत वैकुण्ठलोक की प्रतिकृतियाँ हैं। इस श्वेतद्वीप में न तो ब्रह्माजी, न ही इन्द्र जैसे देवता प्रवेश कर सकते हैं, अपितु उन्हें क्षीरसागर के तट पर खड़े होकर क्षीरोदकशायी विष्णु को अपना सन्देश संप्रेषित करना होता है। अतएव उन्हें यदा-कदा ही भगवान् के दर्शन हो पाते हैं, लेकिन द्वारका के निवासी किसी प्रकार के सकाम कर्म तथा दार्शनिक चिन्तन के भौतिक कल्मष से रहित शुद्ध भक्त होने के कारण भगवत्कृपा से उनका साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। यह जीवों की असली स्थिति है और भक्तिमय सेवा के द्वारा अपनी स्वाभाविक तथा आध्यात्मिक जीवन दशा को जागृत करके प्राप्त की जा सकती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥