श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
अस्त्रतेज: स्वगदया नीहारमिव गोपति: ।
विधमन्तं सन्निकर्षे पर्यैक्षत क इत्यसौ ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
अस्त्र-तेज:—ब्रह्मास्त्र का प्रकाश; स्व-गदया—अपनी गदा से; नीहारम्—ओस के बिन्दु; इव—समान; गोपति:—सूर्य; विधमन्तम्—विनष्ट करने की क्रिया; सन्निकर्षे—निकट; पर्यैक्षत—देखते हुए; क:—कौन; इति असौ—यह शरीर ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् उस ब्रह्मास्त्र के तेज को विनष्ट करने में इस प्रकार संलग्न थे, जिस तरह सूर्य ओस की बँूदों को उड़ा देता है। वे बालक को दिखाई पड़े, तो वह सोचने लगा कि वे कौन थे?
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥