श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
हिरण्यं गां महीं ग्रामान् हस्त्यश्वान्नृपतिर्वरान् ।
प्रादात्स्वन्नं च विप्रेभ्य: प्रजातीर्थे स तीर्थवित् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
हिरण्यम्—सोना; गाम्—गौवें; महीम्—भूमि; ग्रामान्—गाँव; हस्ति—हाथी; अश्वान्—घोड़े; नृपति:—राजा ने; वरान्— पुरस्कार; प्रादात्—दान में दिया; सु-अन्नम्—उत्तम अन्न; च—तथा; विप्रेभ्य:—ब्राह्मणों को; प्रजा-तीर्थे—पुत्र के जन्म-दिवस पर दान देते समय; स:—वह; तीर्थ-वित्—जो जानता है कि कब, कैसे और किसे दान दिया जाय ।.
 
अनुवाद
 
 पुत्र के जन्म लेने पर राजा ने ब्राह्मणों को सोना, भूमि, ग्राम, हाथी, घोड़े तथा उत्तम अन्न दान में दिया, क्योंकि वे जानते थे कि कैसे, कहाँ और कब दान देना चाहिए।
 
तात्पर्य
 केवल ब्राह्मणों तथा संन्यासियों को गृहस्थियों से दान ग्रहण करने का अधिकार प्राप्त है। समस्त संस्कारों के विभिन्न अवसरों पर, विशेष रूप से जन्म, विवाह तथा मृत्यु के संस्कारों के समय, ब्राह्मणों को धन वितरीत किया जाता है, क्योंकि ब्राह्मण ही मानव जाति की प्राथमिक आवश्यकता के लिए सर्वश्रेष्ठ सेवा प्रदान करते हैं। इन अवसरों पर स्वर्ण, भूमि, ग्राम, घोड़े, हाथी तथा अन्न के साथ समस्त भोज्य सामग्री के रूप में प्रचुर दान दिया जाता था। अतएव ब्राह्मण वास्तव में निर्धन नहीं होते थे, उल्टे, उनके पास प्रचुर सोना, भूमि, ग्राम, घोड़े, हाथी तथा पर्याप्त अन्न रहता था, जिससे उन्हें कुछ और कमाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। उसके बदले में, वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण हेतु अपने को समर्पित कर देते थे।

तीर्थवित् शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि राजा को पता था कि कहाँ और कब दान दिया जाय। दान कभी व्यर्थ नहीं जाता, न वह निरूद्देश्य होता है। शास्त्रों के अनुसार, दान उन व्यक्तियों को दिया जाता था, जो अपनी आध्यात्मिक प्रबुद्धता के बल पर दान लेने के पात्र होते थे। तथाकथित दरिद्र-नारायण, जो अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा परम भगवान् के बारे में फैलायी गयी एक भ्रान्त धारणा है, उसका उल्लेख दान के सुपात्र के रूप में शास्त्रों में कभी भी नहीं मिलता है। कोई भी दरिद्र व्यक्ति घोड़े, हाथी, भूमि तथा ग्रामों के रूप में, इतना मुक्तहस्त दान नहीं पा सकता था। निष्कर्ष यह निकला कि बुद्धिमान व्यक्तियों, या भगवान् की सेवा में लगे हुए ब्राह्मणों का इस तरह पालन होता था कि उन्हें शरीर की आवश्यकताओं की चिन्ता नहीं रहती थी तथा राजा एवं अन्य गृहस्थ, खुशी-खुशी उनके सुख का ध्यान रखते थे।

शास्त्रों का आदेश है कि जब तक शिशु नाल द्वारा माता से जुड़ा रहता है, तब तक शिशु तथा माता के शरीर का एक भाग माना जाता है, किन्तु ज्योंही नाल काट दी जाती है और शिशु माता से विलग हो जाता है, त्योंही जात-कर्म संस्कार सम्पन्न किया जाता है। नवजात शिशु को देखने के लिए प्रशासी देवता (लोकपाल) एवं परिवार के पूर्व-पुरखे आते हैं और समाज के आध्यात्मिक विकास के लिए उचित व्यक्तियों को धन वितरित करने के लिए इस अवसर को समुचित माना जाता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥