श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तस्मान्नाम्ना विष्णुरात इति लोके भविष्यति ।
न सन्देहो महाभाग महाभागवतो महान् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—इसलिए; नाम्ना—नामवाले; विष्णु-रात:—भगवान् विष्णु द्वारा रक्षित; इति—इस प्रकार; लोके—समस्त लोकों में; भविष्यति—विख्यात होगा; न—नहीं; सन्देह:—सन्देह; महा-भाग—हे परम भाग्यशाली; महा-भागवत:—प्रथम कोटि का भगवद्भक्त; महान्—समस्त उत्तम गुणों से समन्वित ।.
 
अनुवाद
 
 इस कारण यह बालक संसार में विष्णुरात (भगवान् द्वारा रक्षित) नाम से विख्यात होगा। हे महा भाग्यशाली, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह बालक महाभागवत (उत्तम कोटि का भक्त) होगा और समस्त गुणों से सम्पन्न होगा।
 
तात्पर्य
 भगवान् समस्त जीवों को सुरक्षा प्रदान करते हैं, क्योंकि वे उनके सर्वोपरि नेता हैं। वैदिक स्तोत्र इसकी पुष्टि करते हैं कि भगवान् समस्त पुरुषों में परम पुरुष हैं। इन दोनों व्यक्तियों में अन्तर यह है कि इनमें से एक, अर्थात् भगवान्, अन्य समस्त जीवों का पालन करनेवाले हैं और उन्हें जान लेने से ही शाश्वत शान्ति प्राप्त की जा सकती है (कठोपनिषद् )। ऐसी सुरक्षा उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा विभिन्न कोटि के जीवों को प्रदान की जाती है। किन्तु जहाँ तक उनके अनन्य भक्तों का सम्बन्ध है, वे व्यक्तिगत रूप से उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं। अतएव महाराज परीक्षित की रक्षा अपनी माता के गर्भ में प्रकट होते ही, भगवान् द्वारा शुरू हो गई थी। चूँकि उनकी भगवान् द्वारा विशेष रूप से सुरक्षा की गई थी, अतएव इससे संकेत मिलता था कि यह बालक समस्त उत्तम गुणों से समन्वित महाभागवत निकलेगा। भक्तों की तीन कोटियाँ हैं—महाभागवत, मध्यम अधिकारी तथा कनिष्ठ अधिकारी। ऐसे भक्त जो भगवान् के मन्दिर जाते हैं और आध्यात्मिक विज्ञान में पर्याप्त ज्ञान न होते हुए भी और इस तरह भगवान् के भक्तों के लिए किसी प्रकार का आदर न दिखाकर, अर्चाविग्रह की पूजा करके नमस्कार करते हैं, वे भौतिकतावादी भक्त या कनिष्ठ अधिकारी अर्थात् तृतीय कोटि के भक्त कहलाते हैं। दूसरे भक्त वे हैं, जिन्होंने भगवान् की शुद्ध सेवा की चितवृत्ति विकसित कर ली है और इस तरह वे अपने जैसे भक्तों के साथ मैत्री स्थापित करते हैं, नवदीक्षितों का पक्ष ग्रहण करते हैं और नास्तिकों से बचते हैं, वे द्वितीय कोटि के भक्त कहलाते हैं। किन्तु जो लोग भगवान् में सारी वस्तुएँ देखते हैं या प्रत्येक वस्तु को भगवान् की समझते हैं और प्रत्येक वस्तु में भगवान् का नित्य सम्बन्ध देखते हैं, जिससे उन्हें भगवान् के अतिरक्ति कुछ भी नहीं दिखता, वे महाभागवत या प्रथम कोटि के भगवद्भक्त कहलाते हैं। भगवान् के ऐसे प्रथम कोटि के भक्तगण सभी प्रकार से पूर्ण होते हैं। इन कोटियों के अन्तर्गत कोई भी भक्त स्वत: सर्व गुणों से सम्पन्न रहता है और इस तरह महाराज परीक्षित जैसा महाभागवत सभी प्रकार से पूर्ण होता है। चूँकि महाराज परीक्षित का जन्म महाराज युधिष्ठिर के कुल में हुआ था, इसीलिए उन्हें महाभागवत कहकर सम्बोधित किया गया है। जिस परिवार में महाभागवत जन्म लेता है, वह भाग्यशाली होता है, क्योंकि ऐसे प्रथम कोटि के भक्त के जन्म से, भगवत्कृपा से, परिवार की भूत, वर्तमान तथा भविष्य की सौ पीढिय़ों के लोग मुक्त हो जाते हैं। अतएव भगवान् का अनन्य भक्त बनने मात्र से परिवार को सबसे बड़ा लाभ पहुँचाया जाता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥