श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
एष दाता शरण्यश्च यथा ह्यौशीनर: शिबि: ।
यशो वितनिता स्वानां दौष्यन्तिरिव यज्वनाम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह बालक; दाता—दानी; शरण्य:—शरणागतों का रक्षक; च—तथा; यथा—जिस तरह; हि—निश्चय ही; औशीनर:—उशीनर नामक देश का; शिबि:—शिबि; यश:—यश; वितनिता—फैलानेवाला; स्वानाम्—स्वजनों का; दौष्यन्ति: इव—दुष्यन्त के पुत्र भरत की तरह; यज्वनाम्—अनेक यज्ञ सम्पन्न करनेवालों का ।.
 
अनुवाद
 
 यह बालक सुप्रसिद्ध उशीनर नरेश, शिबि, की भाँति उदार दानवीर तथा शरणागतों का रक्षक होगा। यह अपने कुल के नाम तथा यश को उसी तरह फैला देगा, जिस तरह महाराज दुष्यन्त के पुत्र भरत ने किया था।
 
तात्पर्य
 राजा अपने दान-कर्म, यज्ञों की सम्पन्न करने शरणागतों की रक्षा के कारण विख्यात बनता है। क्षत्रिय राजा शरणागतों को सुरक्षा प्रदान करके गर्वित होता है। राजा की यह मनोवृत्ति ईश्वर भाव अर्थात् अच्छे कार्य के लिए सुरक्षा प्रदान करने की वास्तविक शक्ति कहलाती है। भगवद्गीता में भगवान् जीवों को उपदेश देते हैं कि तुम मेरी शरण में आओ तो मैं तुम्हें समस्त सुरक्षा का वचन देता हूँ। भगवान् सर्वशक्तिमान हैं और अपने वचनों के पक्के हैं, अतएव वे अपने विभिन्न भक्तों को सुरक्षा प्रदान करने से कभी चूकते नहीं। राजा में, भगवान् का प्रतिनिधि होने के कारण, अपने प्राण की बाजी लगाकर भी, शरणागत की रक्षा करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। उशीनर-नरेश महाराज शिबि महाराज ययाति के घनिष्ठ मित्र थे, जो महाराज शिबि समेत स्वर्ग पहुँचने में समर्थ हुए थे। महाराज शिबि को ज्ञात था कि मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्गलोक में जाना है और इस स्वर्गलोक का विवरण महाभारत (आदि पर्व ९६.६-९) में दिया हुआ है। महाराज शिबि इतने प्रणव दानी थे कि वे स्वर्गलोक में प्राप्त अपने स्थान को ययाति को देना चाहते थे, लेकिन ययाति ने उसे स्वीकार नहीं किया। ययाति अष्टक तथा अन्य महर्षियों के साथ स्वर्गलोक गये। ऋषियों के पूछे जाने पर ययाति ने, स्वर्ग जाते समय, उनसे शिबि के पुण्यकर्मों का वर्णन किया। वे यमराज की सभा के सदस्य बने जो उनके पूज्यदेव थे। जैसा कि भगवद्गीता से पुष्ट होता है, देवताओं का उपासक देवलोक को जाता है (यान्ति देवव्रता देवान् ), अतएव महाराज शिबि, उस लोक में परम वैष्णव अधिकारी यमराज के पार्षद बन गये। जब वे पृथ्वी पर विद्यमान थे तो वे शरणागतों के रक्षक तथा दानी के रूप में अत्यन्त विख्यात हो चुके थे। एक बार स्वर्ग के राजा (इन्द्र) ने बाज का रूप धारण किया और अग्नि ने कबूतर का रूप धारण किया। इस कबूतर ने बाज द्वारा पीछा किये जाने पर, महाराज शिबि की गोद में आकर शरण ली, किन्तु बाज चाहता था कि राजा उसे छोड़ दे। राजा उसे खाने के लिए दूसरा मांस देना चाहता था। राजा ने कबूतर को न मारने के लिए अनुनय-विनय की। बाज ने पहले राजा का अनुरोध नहीं माना, लेकिन बाद में यह तय हुआ कि राजा अपने शरीर से कबूतर के भार के बराबर मांस काट कर दे। राजा कबूतर के भार के तुल्य अपने शरीर से मांस काट-काट कर तुला पर रखता जाता, लेकिन रहस्यमय कबूतर सदा भारी ही रहता। तब राजा स्वयं तुला पर चढ़ गया जिससे भार पूरा हो जाये। इस पर देवता उस पर प्रसन्न हो गये। स्वर्ग के राजा तथा अग्निदेव ने अपनी पहचान बताई और राजा को आशीर्वाद दिया। देवर्षि नारद ने भी महाराज शिबि के दान तथा शरणागत की रक्षा के लिए किए गए कार्यों के लिए उनकी महिमा का गान किया। उन्होंने अपने राज्य के मनुष्यों की तुष्टि के लिए अपने पुत्र की बलि दे दी। इस प्रकार बालक परीक्षित दान तथा संरक्षण के मामले में दूसरा शिबि बनेगा।

दौष्यन्ति भरत—इतिहास में अनेक भरत हुए हैं, जिनमें से भगवान् राम के भाई भरत, राजा ऋषभ के पुत्र भरत तथा महाराज दुष्यन्त के पुत्र भरत अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से ये सारे भरत विश्व विख्यात हैं। यह पृथ्वीलोक ऋषभ के पुत्र राजा भरत के कारण भारत या भारतवर्ष के नाम से विख्यात है, लेकिन कुछ लोगों के मतानुसार, यह देश दुष्यन्त के पुत्र के शासन के कारण भारत के नाम से प्रसिद्ध है। लेकिन हमारे मत से इस देश का भारतवर्ष नाम, राजा ऋषभ के पुत्र भरत के शासन के कारण पड़ा है। उनके पूर्व यह भू-भाग इलावर्त-वर्ष कहलाता था, किन्तु ऋषभ-पुत्र भरत के राज्यारोहण के बाद, यह भारतवर्ष नाम से प्रसिद्ध हुआ।

लेकिन इन सबके बावजूद, महाराज दुष्यन्त का पुत्र भरत कम महत्त्वपूर्ण न था। वह सुप्रसिद्ध सुन्दरी शकुन्तला का पुत्र था। महाराज दुष्यन्त वन में इस सुन्दरी के प्रेमपाश में बँधे, तो भरत का गर्भाधान हुआ। तत्पश्चात् दुर्वासा मुनि के शापवश राजा, अपनी पत्नी शकुन्तला को भूल गया। बालक भरत का पालन-पोषण उस वन में ही उसकी माता द्वारा हुआ। वह अपने बाल्यकाल में ही इतना बलशाली था कि वह जंगल के सिंहों तथा हाथियों को ललकारता और उनके साथ वैसे ही लड़ता, जैसे छोटे-छोटे बालक कुत्ते-बिल्लियों से खेलते हैं। बालक के अत्यन्त शक्तिशाली होने से, यहाँ तक कि आधुनिक तथाकथित टार्जन से भी बढक़र होने से, वन के ऋषिगण उसे सर्वदमन कहते थे। महाराज भरत का पूरा विवरण महाभारत के आदि पर्व में दिया हुआ है। कभी-कभी पाण्डवों या कौरवों को भारत कहकर सम्बोधित किया जाता है, क्योंकि वे राजा दुष्यन्त के पुत्र महाराज भरत के कुल में उत्पन्न हुए थे।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥