श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
मृगेन्द्र इव विक्रान्तो निषेव्यो हिमवानिव ।
तितिक्षुर्वसुधेवासौ सहिष्णु: पितराविव ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
मृगेन्द्र:—सिंह; इव—सदृश; विक्रान्त:—शक्तिशाली; निषेव्य:—शरण ग्रहण करने योग्य; हिमवान्—हिमालय पर्वत; इव— सदृश; तितिक्षु:—क्षमावान; वसुधा इव—पृथ्वी के समान; असौ—यह बालक; सहिष्णु:—सहिष्णु; पितरौ—माता-पिता; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 यह बालक सिंह के समान बलशाली तथा हिमालय की भाँति आश्रय प्रदान करनेवाला होगा। यह पृथ्वी के समान क्षमावान तथा अपने माता-पिता के समान सहिष्णु होगा।
 
तात्पर्य
 जब कोई अपने शत्रु का पीछा करने में अत्यन्त प्रबल होता है, तो उसकी तुलना सिंह से की जाती है। मनुष्य को घर में मेमना बने रहना चाहिए, किन्तु शत्रु का पीछा करते समय उसे सिंह होना चाहिए। सिंह कभी पशु को पकडऩे में असफल नहीं होता। इसी प्रकार राज्य के प्रमुख को शत्रु का पीछा करने में कभी असफल नहीं होना चाहिए। हिमालय पर्वत अपनी समृद्धि के लिए विख्यात है। वहाँ रहने के लिए अनेक कन्दराएँ हैं, खाने के लिए उत्तम फलदार वृक्ष हैं, पानी पीने के लिए निर्मल झरने हैं और रोगों को ठीक करने की अनेक औषधियाँ तथा खनिज हैं। जो व्यक्ति भौतिक रूप से सम्पन्न न हो, उसे चाहिए कि इन पर्वतों की शरण ले, तो उसे सारी वस्तुएँ उपलब्ध हो जाएँगी। भौतिकतावादी तथा अध्यात्मवादी दोनों ही समान रूप से हिमालय की शरण ग्रहण कर सकते हैं। पृथ्वी के निवासियों द्वारा पृथ्वी पर अनेक उत्पात मचाये जाते हैं। आधुनिक युग में लोग पृथ्वी की सतह पर परमाणु अस्त्रों का विस्फोट करने लगे हैं, फिर भी पृथ्वी इन निवासियों के उत्पातों को सहती रहती है। माता-पिता बच्चों की समस्त प्रकार की शैतानियों को सहते रहते हैं जिस प्रकार एक माता छोटे बच्चे को क्षमा करती है। आदर्श राजा में ये सारे उत्तम गुण होने चाहिए और बालक परीक्षित इन सारे गुणों से परिपूर्ण होने की भविष्यवाणी की जा रही है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥