श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
राजर्षीणां जनयिता शास्ता चोत्पथगामिनाम् ।
निग्रहीता कलेरेष भुवो धर्मस्य कारणात् ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
राज-ऋषीणाम्—ऋषि तुल्य राजाओं का; जनयिता—उत्पन्न करनेवाला; शास्ता—दण्ड देनेवाला; च—तथा; उत्पथ- गामिनाम्—मर्यादा उल्लंघन करनेवालों का; निग्रहीता—दमनकर्ता; कले:—उपद्रव करनेवालों का; एष:—यह; भुव:—संसार को; धर्मस्य—धर्म के; कारणात्—कारण से ।.
 
अनुवाद
 
 यह बालक ऋषि तुल्य राजाओं का पिता होगा। विश्व-शान्ति तथा धर्म के निमित्त यह मर्यादा तोडऩेवालों तथा उपद्रवकारियों को दण्ड देनेवाला होगा।
 
तात्पर्य
 संसार में सबसे विचक्षण व्यक्ति भगवान् का भक्त होता है। ऋषिगण प्रज्ञावान व्यक्ति कहलाते हैं और ज्ञान की विविध शाखाओं के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के प्रज्ञावान् व्यक्ति होते हैं। अतएव जब तक राजा, या किसी राज्य का अध्यक्ष, सबसे बुद्धिमान व्यक्ति नहीं होता, तब तक वह राज्य के सभी प्रकार के बुद्धिमान व्यक्तियों को वश में नहीं रख सकता। महाराज युधिष्ठिर के कुल की राजसी परम्परा से सारे राजा बिना किसी अपवाद के अपने काल के सर्वाधिक विचक्षण व्यक्ति थे और ऐसी ही भविष्यवाणी महाराज परीक्षित तथा उनके होनेवाले पुत्र महाराज जनमेजय के विषय में की जा रही थी। ऐसे प्रज्ञावान राजा ही मर्यादा तोडऩेवालों को दण्ड देनेवाले तथा कलि अर्थात् या झगड़ालू तत्त्वों के विच्छेदक बन सकते हैं। जैसाकि अगले अध्यायों से स्पष्ट हो जायेगा, महाराज परीक्षित मूर्तिमंत कलि का वध करना चाहते थे, क्योंकि वह शान्ति तथा धर्म की प्रतीक गाय को मारने का प्रयत्न कर रहा था। कलि के लक्षण हैं—(१) सुरा, (२) स्त्रियाँ, (३) द्यूत क्रीड़ा तथा (४) कसाई घर। समस्त राज्यों के बुद्धिमान शासकों को चाहिए कि वे महाराज परीक्षित से शिक्षा ग्रहण करें कि किस तरह उन मर्यादा भंग करनेवालों का तथा उपद्रव करनेवालों का दमन करके शान्ति तथा नैतिकता स्थिर रखी जाती है, जो सुरा, सुन्दरी, द्यूत क्रीड़ा तथा नियमित रूप से चलाये जा रहे कसाईघरों से मिलनेवाले मांस का सेवन करते हैं। इस कलियुग में कलह उत्पन्न करने वाले इन विभिन्न विभागों को चालू रखने के लिए लाइसेंस दिये जाते हैं। तो ऐसे राज्य में शान्ति तथा नैतिकता की आशा किस तरह की जा सकती है? अतएव राज्य के जनकों को भगवान् की भक्ति द्वारा, अनुशासन को भंग करनेवालों को दण्ड देकर तथा कलह के लक्षणों का उन्मूलन करके चतुर बनने के सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए। यदि हम प्रज्ज्वलित अग्नि चाहते हैं, तो सूखे ईंधन का प्रयोग करना पड़ेगा, क्योंकि प्रज्ज्वलित अग्नि तथा गीले ईंधन का मेल नहीं होता। शान्ति तथा नैतिकता वहीं फल-फूल सकती हैं, जहाँ महाराज परीक्षित तथा उनके अनुयायियों के सिद्धान्तों का पालन होता हो।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥