श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
जिज्ञासितात्मयाथार्थ्यो मुनेर्व्याससुतादसौ ।
हित्वेदं नृप गङ्गायां यास्यत्यद्धाकुतोभयम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
जिज्ञासित—जिज्ञासा करते हुए; आत्म-याथार्थ्य:—आत्मा का सही ज्ञान; मुने:—विद्वान, दार्शनिक; व्यास-सुतात्—व्यास के पुत्र से; असौ—वह; हित्वा—त्यागकर; इदम्—इस भौतिक आसक्ति को; नृप—हे राजा; गङ्गायाम्—गंगा के तट पर; यास्यति—जाएगा; अद्धा—सीधे; अकुत:-भयम्—निर्भय जीवन ।.
 
अनुवाद
 
 व्यासेदव के महान् दार्शनिक पुत्र से समुचित आत्म-ज्ञान के विषय में जिज्ञासा करने पर वह सारी भौतिक आसक्ति का परित्याग करेगा और निर्भय जीवन प्राप्त करेगा।
 
तात्पर्य
 भौतिक ज्ञान का अर्थ है, आत्म-ज्ञान से अनभिज्ञता। दर्शन का अर्थ है सही आत्म-ज्ञान की खोज करना, अर्थात् आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान। आत्म-साक्षात्कार के बिना का दर्शन मात्र शुष्क चिन्तन या समय तथा शक्ति का अपव्यय मात्र है। श्रीमद्भागवत वास्तविक आत्मज्ञान देता है और श्रीमद्भागवत सुनकर मनुष्य भौतिक आसक्ति से मुक्त होकर निर्भयता के साम्राज्य (अभयपद) में प्रवेश कर सकता है। यह भौतिक जगत भय-प्रद है। इसके बन्दी सदैव इस तरह भयभीत रहते हैं मानो बन्दीगृह के भीतर हों। बन्दीगृह का कोई भी व्यक्ति बन्दीगृह के विधि-विधानों का उल्लंघन नहीं कर सकता और यदि करता है, तो उसका अर्थ है बन्दी-जीवन की एक और कालावधि का विस्तार। इसी प्रकार हम इस भौतिक जगत में हम सदा भयभीत बने रहते हैं। यह भयातुरता चिन्ता कहलाती है। भौतिक जीवन में समस्त योनियों में हर कोई या तो प्रकृति के नियमों को तोडऩे से या तोड़े बिना भी, चिन्ताग्रस्त रहता है। मुक्ति का अर्थ है इन अनवरत स्थायी चिन्ताओं से मुक्ति प्राप्त करना। यह तभी सम्भव है, जब चिन्ता को भगवद्-भक्ति में परिणत कर दिया जाय। श्रीमद्भागवत हमें अवसर प्रदान करता है कि हम चिन्ता के गुण को पदार्थ से अध्यात्म में बदल दें। ऐसा विद्वान दार्शनिकों की संगति से, जैसे कि श्रीव्यासदेव के महान् पुत्र, स्वरूपसिद्ध शुकदेव गोस्वामी की संगति से सम्भव है। महाराज परीक्षित ने अपनी मृत्यु की चेतावनी मिलने के बाद इस अवसर का लाभ शुकदेव गोस्वामी की संगति करके उठाया और वांछित फल प्राप्त किया।

व्यावसायिक व्यक्तियों द्वारा श्रीमद्भागवत के इस तरह से वाचन तथा श्रवण का अनुकरण किया जाता है और मूर्ख श्रोता सोचते हैं कि वे भौतिक आसक्ति के चंगुल से छुटकारा प्राप्त करके अभय-पद का जीवन प्राप्त कर सकेंगे। श्रीमद्भागवत का ऐसा अनुकरणात्मक श्रवण उपहासास्पद होता है और मनुष्य को ऐसे मसखरे लालची लोगों द्वारा भौतिक भोग को बनाये रखने के लिए सम्पन्न किये जानेवाले भागवतम् सप्ताह के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥