श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तदिदं श्रोतुमिच्छामो गदितुं यदि मन्यसे ।
ब्रूहि न: श्रद्दधानानां यस्य ज्ञानमदाच्छुक: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—सारा; इदम्—यह; श्रोतुम्—सुनने को; इच्छाम:—सभी इच्छा कर रहे हैं; गदितुम्—वर्णन करने को; यदि—यदि; मन्यसे—आप सोचते हों; ब्रूहि—कृपा करके कहें; न:—हमसे; श्रद्दधानानाम्—श्रद्धालुओं को; यस्य—जिसका; ज्ञानम्— दिव्य ज्ञान; अदात्—प्रदान किया; शुक:—श्री शुकदेव गोस्वामी ने ।.
 
अनुवाद
 
 हम सभी अत्यन्त आदरपूर्वक उनके (महाराज परीक्षित के) विषय में सुनना चाहते हैं, जिन्हें शुकदेव गोस्वामी ने दिव्य ज्ञान प्रदान किया। कृपया हमें इस विषय में बताएँ।
 
तात्पर्य
 शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को उनके जीवन के अन्तिम सात दिनों में दिव्य ज्ञान प्रदान किया, जिसे महाराज ने श्रद्धालु शिष्य की भाँति ठीक से सुना। श्रीमद्भागवत के इस प्रकार के प्रामाणिक श्रवण तथा कीर्तन का प्रभाव श्रोता तथा वक्ता पर समान रूप से पड़ता है। इससे दोनों लाभान्वित हुए थे। भागवत में भक्ति के जिन नौ विभिन्न दिव्य साधनों का वर्णन हुआ है, यदि उनमें से सभी या कुछ का या किसी एक का भी ठीक से पालन हो, तो वे समान रूप से लाभप्रद होते हैं। महाराज परीक्षित तथा शुकदेव गोस्वामी, दोनों ही प्रथम दो साधनों अर्थात् श्रवण तथा कीर्तन के साधक थे। अतएव दोनों ही अपने प्रशंसनीय प्रयास में सफल रहे। दिव्य अनुभूति ऐसे ही गभ्भीर श्रवण तथा कीर्तन से होती है, अन्यथा नहीं। इस कलियुग में गुरु तथा शिष्य सम्बन्धी एक विशेष प्रकार का विज्ञापन हो रहा है। कहा जाता है कि गुरु द्वारा उत्पन्न विद्युत्-धारा के द्वारा, शिष्य में आध्यात्मिक शक्ति प्रविष्ट की जाती है, जिससे शिष्य को उसका आघात अनुभव होता है। इससे वह अचेत हो जाता है और गुरु तथाकथित आध्यात्मिक निधि के क्षीण हो जाने पर रोता है। इस युग में इस तरह का झूठा विज्ञापन चल रहा है और निरीह जनता ऐसे विज्ञापन का शिकार बन रही है। किन्तु शुकदेव गोस्वामी तथा उनके महान् शिष्य महाराज परीक्षित के आचरण के विषय में हमें ऐसी लोक-कथाएँ प्राप्त नहीं होतीं। मुनि ने अत्यन्त भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवत सुनाई थी और राजा ने उसे अत्यन्त नियमपूर्वक सुना था। राजा ने न तो अपने गुरु से किसी प्रकार की विद्युत्-धारा के आघात का अनुभव किया था, न ही अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त करते समय वे अचेत हुए थे। अतएव लोगों को चाहिए कि वे वैदिक ज्ञान के इन निठल्ले प्रतिनिधियों द्वारा किये जा रहे इस प्रकार के अप्रामाणिक विज्ञापनों के बहकावे में न आएँ। नैमिषारण्य के ऋषि-मुनि महाराज परीक्षित के विषय में अत्यन्त आदरपूर्वक श्रवण कर रहे थे, क्योंकि उन्होंने गभ्भीर श्रवण द्वारा शुकदेव गोस्वामी से ज्ञान प्राप्त किया था। दिव्य ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र साधन यह है कि उसे प्रामाणिक गुरु से गभ्भीर श्रवण द्वारा ग्रहण किय जाय। उसके लिए आश्चर्यजनक प्रभावों को उत्पन्न करने हेतु न तो किसी चिकित्सीय करतब की, न ही योग के चमत्कार की आवश्यकता है। यह विधि सरल है, लेकिन एकनिष्ठ होने पर ही मनोवांछित फल मिल सकता है।
 
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