श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
स एष लोके विख्यात: परीक्षिदिति यत्प्रभु: ।
पूर्वं द‍ृष्टमनुध्यायन् परीक्षेत नरेष्विह ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; एष:—इस; लोके—संसार में; विख्यात:—प्रसिद्ध; परीक्षित्—परीक्षा लेने वाला; इति—इस प्रकार; यत्—जो; प्रभु:—हे राजा; पूर्वम्—पहले; दृष्टम्—देखा जा चुका; अनुध्यायन्—निरन्तर विचारा जाकर; परीक्षेत—परीक्षा लेगा; नरेषु— प्रत्येक व्यक्ति की; इह—यहाँ ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह यह पुत्र संसार में परीक्षित (परीक्षक) नाम से विख्यात होगा, क्योंकि यह उन व्यक्ति की खोज करने के लिए सारे मनुष्यों का परीक्षण करेगा, जिन्हें इसने अपने जन्म के पूर्व देखा है। इस तरह यह निरन्तर उनका (भगवान् का) चिन्तन करता रहेगा।
 
तात्पर्य
 महाराज परीक्षित भाग्यशाली थे, क्योंकि माता के गर्भ में रहते हुए ही उन पर भगवान् की छाप पड़ चुकी थी, अतएव वे निरन्तर भगवान् का चिन्तन किया करते थे। एक बार यदि भगवान् के दिव्य रूप की छाप किसी के मन में स्थित हो जाय, तो वह भगवान् को भुलाये नहीं भूल सकता। बालक परीक्षित गर्भ से बाहर आने के बाद, प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा यह देखने के लिए करता रहता था कि कहीं यह वही व्यक्ति तो नहीं हैं, जिसे उसने गर्भ में सर्वप्रथम देखा था। लेकिन भगवान् के समान या उनसे बढक़र आकर्षक कोई नहीं हो सकता, अतएव वह बालक किसी को स्वीकार नहीं कर सका। लेकिन ऐसी परीक्षा के द्वारा भगवान् निरन्तर उसके साथ रहे और इस तरह स्मरण के द्वारा, महाराज परीक्षित भगवान् की भक्ति में सदैव लगे रहते।

इस प्रसंग में श्रील जीव गोस्वामी की टीका है कि यदि प्रत्येक बालक पर बचपन से ही भगवान् की छाप पड़ जाय, तो वह निश्चित रूप से महाराज परीक्षित की ही भाँति भगवद्भक्त बन सकता है। भले ही कोई महाराज परीक्षित की तरह इतना भाग्यशाली न हो कि उसे माता के गर्भ में ही भगवान् के दर्शन हो लें, लेकिन यदि बालक के माता-पिता चाहें, तो वह ऐसा बन सकता है। इस प्रसंग में मैं अपना व्यावहारिक उदाहरण दे सकता हूँ। मेरे पिता भगवान् के शुद्ध भक्त थे और जब मैं चार-पाँच वर्ष का था, तो मेरे पिता ने मुझे राधा-कृष्ण की एक युगल मूर्ति प्रदान की थी। मैं खेल-खेल में, अपनी बहन के साथ इन विग्रहों की पूजा किया करता था और मैं निकट के राधा-गोविन्द मन्दिर की पूजाविधि का अनुकरण किया करता था। निरन्तर इस मन्दिर में जाकर तथा वहाँ होनेवाले उत्सवों का अपने खेल के विग्रहों के साथ अनुकरण करके मैंने भगवान् के प्रति सहज आकर्षण विकसित कर लिया। मेरे पिता मेरी स्थिति के अनुरूप इन उत्सवों का अवलोकन करते थे। बाद में स्कूल तथा कालेज जाने के कारण, मेरे ये कार्यकलाप ठप्प हो गये और मेरा अभ्यास छूट गया। किन्तु अपनी युवावस्था में, जब मैं अपने गुरु श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज से मिला, तो मेरी पुरानी अभिरुचि फिर से जागृत हो उठी और वही खेल की मूर्तियाँ मेरे आराध्य अर्चा-विग्रह बन गईं। यह तब तक चलता रहा, जब तक मैंने पारिवारिक सम्बन्ध नहीं तोड़ लिये और मुझे प्रसन्नता है कि मेरे पिता ने मुझ पर जो पहली छाप छोड़ी, वह गुरू की कृपा से बाद में भक्ति में विकसित हो सकी। महाराज प्रह्लाद ने भी यही उपदेश दिया है कि इस प्रकार ईश्वरी छाप बाल्यपन के प्रारम्भ में ही पड़ जानी चाहिए। अन्यथा जीव मनुष्य जीवन रूपी सुअवसर को खो सकता है, जो अन्य रूपों की भाँति नश्वर होते हुए भी अत्यन्त मूल्यवान है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥