श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुप: ।
आपूर्यमाण: पितृभि: काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; राज-पुत्र:—राजकुमार; ववृधे—बड़ा हो गया; आशु—जल्दी ही; शुक्ले—शुक्लपक्ष; इव—सदृश; उडुप:— चन्द्रमा; आपूर्यमाण:—विलासपूर्ण; पितृभि:—पिता जैसे संरक्षकों द्वारा; काष्ठाभि:—पूर्ण विकास; इव—सदृश; स:—वह; अन्वहम्—दिन-प्रतिदिन ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह शुक्लपक्ष में चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है, उसी तरह यह राजकुमार (परीक्षित) शीघ्र ही अपने संरक्षक पितामहों की देख-रेख तथा सुख-सुविधाओं के बीच तेजी से विकास करने लगा।
 
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥