श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
यक्ष्यमाणोऽश्वमेधेन ज्ञातिद्रोहजिहासया ।
राजा लब्धधनो दध्यौ नान्यत्र करदण्डयो: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
यक्ष्यमाण:—सम्पन्न करने की इच्छा करते हुए; अश्वमेधेन—अश्वमेध उत्सव द्वारा; ज्ञाति-द्रोह—स्वजनों से युद्ध; जिहासया— मुक्त होने के लिए; राजा—राजा युधिष्ठिर; लब्ध-धन:—कुछ धन प्राप्त करने के लिए; दध्यौ—विचार किया; न अन्यत्र— अन्यथा नहीं; कर-दण्डयो:—लगान तथा जुर्माना ।.
 
अनुवाद
 
 इसी समय राजा युधिष्ठिर स्वजनों से युद्ध करने के कारण किए गए पापों से मुक्ति पाने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने पर विचार कर रहे थे। लेकिन उन्हें कुछ धन प्राप्त करने की चिन्ता सवार थी, क्योंकि लगान तथा जुर्माने से एकत्र कोष के अतिरिक्त और कोई धन-संग्रह न था।
 
तात्पर्य
 जिस तरह ब्राह्मणों तथा विप्रों को राज्य की तरफ से कुछ आर्थिक सहायता का अधिकार मिला हुआ था, उसी तरह राज्य के कार्यकारी अध्यक्ष को अधिकार था कि वह नागरिकों से कर तथा जुर्माने एकत्र करे। कुरुक्षेत्र के युद्ध के पश्चात् राजकोष खाली हो चुका था, अतएव कर तथा जुर्माना-संग्रह के अलावा कोई अतिरिक्त निधि नहीं थी। ऐसा कोष केवल राज्य-व्ययों के लिए ही पर्याप्त था तथा और कोई निधि न होने से राजा चिन्तित थे कि किसी अन्य विधि से वे अधिक धन प्राप्त करे, जिससे अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हो सके। महाराज युधिष्ठिर इस यज्ञ को भीष्मदेव के आदेशानुसार सम्पन्न करना चाह रहे थे।
 
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