श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
आहूतो भगवान् राज्ञा याजयित्वा द्विजैर्नृपम् ।
उवास कतिचिन्मासान् सुहृदां प्रियकाम्यया ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
आहूत:—बुलाये जाने पर; भगवान्—भगवान् श्रीकृष्ण; राज्ञा—राजा द्वारा; याजयित्वा—सम्पन्न कराकर; द्विजै:—विद्वान ब्राह्मणों द्वारा; नृपम्—राजा की ओर से; उवास—निवास किया; कतिचित्—थोड़े; मासान्—महीने; सुहृदाम्—सम्बन्धियों के लिए; प्रिय-काम्यया—प्रसन्नता के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज युधिष्ठिर द्वारा यज्ञ में आमंत्रित होकर, भगवान् श्रीकृष्ण ने इस बात का ध्यान रखा कि ये सारे यज्ञ योग्य (द्विज) ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न कराये जाएँ। तत्पश्चात् सम्बन्धियों की प्रसन्नता के लिए, भगवान् वहाँ कुछेक मास रहते रहे।
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण को महाराज युधिष्ठिर ने यज्ञ सम्पन्नता का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया था और भगवान् ने अपने अग्रज के आदेशों का पालन करने के लिए, विद्वान द्विज ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ सम्पन्न कराया। केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ही कोई यज्ञ कराने का अधिकारी नहीं बन जाता। उसे समुचित प्रशिक्षण तथा प्रामाणिक आचार्य से दीक्षा ग्रहण करके द्विज बनना होता है। ब्राह्मण कुलों की एकजन्मा सन्तानें शूद्रों के तुल्य होती हैं। अतएव ऐसे ब्रह्म-बन्धुओं को किसी ऐसे धार्मिक या वैदिक उत्सव के निमित्त अस्वीकार कर देना चाहिए। श्रीकृष्ण को यह प्रबन्ध देखना था और चूँकि वे परम पूर्ण हैं, अतएव उन्होंने सफल सम्पन्नता के लिए प्रामाणिक द्विज ब्राह्मणों द्वारा यज्ञों को सम्पन्न कराया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥