श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
नन्वप्रियं दुर्विषहं नृणां स्वयमुपस्थितम् ।
नावेदयत् सकरुणो दु:खितान् द्रष्टुमक्षम: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
ननु—निश्चय ही; अप्रियम्—अप्रिय; दुर्विषहम्—असह्य; नृणाम्—मानव जाति का; स्वयम्—अपने ढंग से; उपस्थितम्— प्राकट्य; न—नहीं; आवेदयत्—व्यक्त किया; सकरुण:—दयामय; दु:खितान्—दुखी जनों को; द्रष्टुम्—देखने के लिए; अक्षम:—असमर्थ ।.
 
अनुवाद
 
 दयावान महात्मा विदुर पाण्डवों को कभी भी दुखी नहीं देख सकते थे। अतएव उन्होंने इस अप्रिय तथा असह्य घटना को प्रकट नहीं होने दिया, क्योंकि आपदाएँ तो अपने आप आती हैं।
 
तात्पर्य
 नीतिशास्त्र के अनुसार, ऐसा अप्रिय सत्य नहीं कहना चाहिए, जिससे अन्यों को कष्ट हो। विपदा सदैव प्रकृति के नियमानुसार स्वत: आती है। अतएव इसका प्रचार करते हुए इसे अधिक उभारना नहीं चाहिए। विदुर जैसे दयावान व्यक्ति के लिए, विशेष रूप से प्रिय पाण्डवों के साथ व्यवहार करते हुए, यदुवंश के विनाश जैसी अप्रिय घटना को उद्धाटित करना प्राय: असम्भव था। इसीलिए उन्होंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥