श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
कञ्चित्कालमथावात्सीत्सत्कृतो देववत्सुखम् ।
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य श्रेयस्कृत्सर्वेषां सुखमावहन् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
कञ्चित्—कुछ दिनों तक; कालम्—समय; अथ—इस प्रकार; अवात्सीत्—रहते रहे; सत्-कृत:—सम्मानित होने पर; देव वत्—दैवी व्यक्ति के समान; सुखम्—सुविधाएँ; भ्रातु:—भाई का; ज्येष्ठस्य—बड़े भाई का; श्रेय:-कृत्—उनके प्रति अच्छाई करने के कारण; सर्वेषाम्—आप सबों का; सुखम्—सुख; आवहन्—सम्भव बनाया ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार अपने कुटुम्बियों द्वारा देवतुल्य सम्मानित होकर, महात्मा विदुर कुछ काल तक अपने बड़े भाई की मनोदशा को ठीक करने के लिए तथा इस प्रकार अन्य सबों को सुख देने के लिए वहाँ पर रहते रहे।
 
तात्पर्य
 विदुर जैसे महात्मा पुरुषों का सत्कार स्वर्ग के निवासियों जैसा होना चाहिए। उन दिनों, स्वर्ग के निवासी महाराज युधिष्ठिर जैसे लोगों के घरों में आया करते थे और कभी-कभी अर्जुन जैसे व्यक्ति स्वर्ग-लोक की यात्रा किया करते थे। नारद तो ऐसे अन्तरिक्ष-यात्री हैं, जो बिना रोक-टोक के न केवल भौतिक ब्रह्माण्डों में, अपितु आध्यात्मिक लोकों में भी विचरण कर सकते हैं। नारद भी महाराज युधिष्ठिर के महलों में आते जाते थे, तो फिर अन्य देवताओं के विषय में कहना ही क्या। सम्बद्ध लोगों की आध्यात्मिक संस्कृति से ही, विभिन्न लोकों के मध्य इसी शरीर से यात्रा कर पाना सम्भव है। अतएव महाराज युधिष्ठिर ने विदुर का वैसा ही सत्कार किया, जैसा देवताओं का किया जाता है।

महात्मा विदुर पहले ही वानप्रस्थ जीवन स्वीकार कर चुके थे। अतएव वे अपने पैतृक महल में भी कोई भौतिक सुख भोगने नहीं आये थे। उन्होंने अपनी कृपा से ही महाराज युधिष्ठिर द्वारा अर्पित सेवाभाव का स्वीकार किया, लेकिन उस महल में रहने का एकमात्र उद्देश्य अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र का उद्धार करना था, जो सांसारिकता में अत्यधिक आसक्त थे। धृतराष्ट्र ने महाराज युधिष्ठिर से युद्ध करके अपना सारा राजपाट तथा सारे वंशज खो दिये थे; तो भी अपनी असहाय अवस्था के कारण वे महाराज युधिष्ठिर का दान तथा आतिथ्य ग्रहण करने में लज्जा का अनुभव नहीं कर रहे थे। महाराज युधिष्ठिर के लिए यह बिल्कुल उचित था कि वे अपने ताऊ को समुचित ढंग से रख रहे थे, किन्तु इस प्रकार का भव्य आतिथ्य धृतराष्ट्र के लिए स्वीकार करना उचित न था। उन्होंने इसे स्वीकार कर रखा था, क्योंकि उन्होंने सोचा कि अन्य कोई विकल्प न था। विदुर वहाँ पर विशेष रूप से धृतराष्ट्र को प्रबुद्ध करने तथा उन्हें उच्चतर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कराने के उद्देश्य से ही आये थे। प्रबुद्ध व्यक्तियों का यह कर्तव्य है कि वे पतितात्माओं का उद्धार करें और विदुर इसी उद्देश्य से आये थे। किन्तु आध्यात्मिक प्रबोध की बातें इतनी सुहावनी होती हैं कि जब विदुर धृतराष्ट्र को उपदेश दे रहे थे, तो परिवार के सारे सदस्य उनकी ओर आकृष्ट हो गये और सबों ने धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुनने में आनन्द का अनुभव किया। आध्यात्मिक अनुभूति की यही विधि है। सन्देश को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए और यदि किसी अनुभूत व्यक्ति द्वारा यह सन्देश दिया जाता है, तो यह बद्धजीव के सुप्त हृदय पर प्रभाव डालता है। और निरन्तर श्रवण करते रहने से मनुष्य आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥