श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथावदघकारिषु ।
यावद्दधार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यम: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
अबिभ्रत्—दिया गया; अर्यमा—अर्यमा; दण्डम्—दण्ड; यथावत्—समुचित; अघ-कारिषु—पाप करनेवालों को; यावत्—जब तक; दधार—स्वीकार किया; शूद्रत्वम्—शूद्र का शरीर; शापात्—शाप के फलस्वरूप; वर्ष-शतम्—सौ वर्षों तक; यम:— यमराज ।.
 
अनुवाद
 
 मण्डूक मुनि के द्वारा शापित होकर, जब तक विदुर शूद्र का शरीर धारण किये रहे, तब तक पाप कर्म करने वालों को दण्डित करने के लिए यमराज के पद पर अर्यमा कार्य करते रहे।
 
तात्पर्य
 विदुर शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण, अपने भाइयों—धृतराष्ट्र तथा पाण्डु के साथ राज्य के उत्तराधिकार से भी वंचित थे; तो भला वे धृतराष्ट्र तथा महाराज युधिष्ठिर जैसे विद्वान राजाओं एवं क्षत्रियों के शिक्षक पद पर कैसे रह सकते थे? इसका पहला उत्तर यह है कि यद्यपि वे जन्म से शूद्र माने जाते थे, लेकिन चूँकि उन्होंने ऋषि मैत्रेय के आदेशानुसार आध्यात्मिक उन्नति के लिए संसार का परित्याग कर दिया था और उनसे आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी, अतएव वे आचार्य पद को ग्रहण करने के लिए पूर्णतया सक्षम थे। श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुसार कोई भी व्यक्ति, जो दिव्य ज्ञान या ईश-तत्त्व में निपुण है, वह चाहे ब्राह्मण हो या शूद्र, गृहस्थ हो या संन्यासी, गुरु होने के लिए योग्य है। यहाँ तक कि सामान्य नीतिशास्त्र में (महान् राजनीतिज्ञ तथा नीतिविद् चाणक्य पंडित के मतानुसार) शूद्र से भी निम्न व्यक्ति से शिक्षा ग्रहण करने में कोई हानि नहीं मानी गई। यह उत्तर का एक अंश हुआ। दूसरा अंश यह है कि विदुर वास्तव में शूद्र न थे। उन्हें मण्डूक मुनि के शाप के कारण, एक सौ वर्षों तक शूद्र की भूमिका निभानी थी। वे यमराज के अवतार थे, जो बारह महाजनों में से एक थे और ब्रह्मा, नारद, शिव, कपिल, भीष्म, प्रह्लाद इत्यादि महापुरुषों के समान उच्च पद पर थे। महाजन होने के कारण, यमराज का कर्तव्य है कि वे विश्व के लोगों को भक्ति सम्प्रदाय का उसी प्रकार उपदेश दें जिस प्रकार नारद, ब्रह्मा तथा अन्य महाजन करते हैं। किन्तु यमराज सदैव अपने राज्य में पापकर्म करनेवालों को दण्ड देने के कार्य में ही व्यस्त रहते हैं। भगवान् ने यमराज को एक विशेष ग्रह के लिए, जो पृथ्वी से कुछ लाखों मील दूरी पर स्थित है, नियुक्त किया है, जहाँ वे मृत्यु के बाद भ्रष्ट जीवात्माओं को ले जाकर उनके पाप कर्मों के अनुसार दण्ड दें। अतएव यमराज को दुष्कर्म करनेवालों को दण्ड देने के उत्तरदायी काम से ही फुरसत नहीं मिल पाती। दुष्कर्म करनेवालों की संख्या सत्कर्मियों से अधिक है। अतएव यमराज को भगवान् द्वारा अधिकृत अन्य देवों की अपेक्षा अधिक कार्य करना पड़ता है। लेकिन यमराज तो भगवान् की महिमा का उपदेश देना चाहते थे। अतएव भगवत् इच्छा से मण्डूक मुनि के शाप के कारण, उन्हें विदुर के अवतार रूप में इस पृथ्वी पर आने का मौका मिला और महान् भक्त की तरह निरन्तर भगवान् की सेवा में जुटने का मौका मिला। ऐसा भक्त न तो शूद्र होता है, न ब्राह्मण। वह संसारी समाज के ऐसे विभाजन से परे होता है, जिस प्रकार भगवान् शूकर के रूप में अवतरित होकर भी न तो शूकर हैं, न ही ब्रह्मा हैं। वे समस्त संसारी प्राणियों के ऊपर हैं। कभी-कभी, भगवान् तथा उनके विभिन्न अधिकृत भक्तों को बद्धजीवों के उद्धार हेतु निम्नतर प्राणियों की भूमिका अदा करनी पड़ती है, किन्तु भगवान् तथा उनके शुद्ध भक्त दोनों सदैव दिव्य पद पर बने रहते हैं। जब यमराज इस तरह विदुर के रूप में अवतरित हुए, तो कश्यप तथा अदिति के अनेक पुत्रों में से एक, अर्यमा ने यह पद सँभाला। आदित्यगण अदिति के पुत्र हैं और आदित्यों की संख्या बारह है। अर्यमा इन बारह आदित्यों में से एक है। अतएव विदुर की अनुपस्थिति में सौ वर्षों तक यमराज के कार्यभार को सँभालने के लिए अर्यमा का चुनाव ठीक ही था। निष्कर्ष यह है कि विदुर कभी भी शूद्र न थे, वे तो शुद्धतम ब्राह्मण से भी महान् थे।
 
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