श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
एवं गृहेषु सक्तानां प्रमत्तानां तदीहया ।
अत्यक्रामदविज्ञात: काल: परमदुस्तर: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; गृहेषु—घरेलू मामलों में; सक्तानाम्—अत्यन्त आसक्त पुरुषों के; प्रमत्तानाम्—बेवकूफी से आसक्त; तत्- ईहया—ऐसे विचारों में निमग्न; अत्यक्रामत्—पार कर गया; अविज्ञात:—अनजाने; काल:—सनातन काल; परम—परम; दुस्तर:—दुर्लंघ्य ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग घरेलू मामलों में अत्यधिक लिप्त रहते हैं और उन्हीं के विचारों में मग्न रहते जाते हैं, उन्हें दुस्तर सनातन काल अनजाने ही धर दबोचता है।
 
तात्पर्य
 “मैं अब सुखी हूँ; अब सब कुछ ठीक-ठीक है; मेरे पास बैंक में प्रचुर धन है; अब मैं अपने लडक़ों को काफी जागीर दे सकता हूँ; अब मैं सफल हूँ; ये भिखारी संन्यासी ईश्वर पर आश्रित तो रहते हैं, किन्तु वे मेरे सामने हाथ फैलाने आते हैं, अतएव मैं परमेश्वर से भी बढक़र हूँ।” ये कुछ विचार हैं, जो उन प्रमत्त आसक्त गृहस्थों के मनों में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं, जो शाश्वत काल के प्रति अन्धे रहते हैं। हमारी आयु सीमित है और परम इच्छा से नियत किये गये काल के विपरीत, इसे एक क्षण भी बढ़ा पाना सम्भव नहीं है। मनुष्यों के लिए ऐसा समय अत्यन्त मूल्यवान है और इसे सतर्कता से बिताया जाना चाहिए, क्योंकि अदृश्य रूप से बीते एक क्षण को कठिन कमाई से संग्रह किये गये हजारों सोने के सिक्कों से भी बदला नहीं जा सकता। मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अन्तत: जीवन की समस्याओं को हल करने के निमित्त अर्थात् बारम्बार जन्म-मृत्यु एवं ८४,००,००० योनियों में भटकते रहने से छुटकारा पाने के लिए है। यह भौतिक शरीर, जो जन्म तथा मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे से ग्रस्त होता रहता है, जीव के समस्त कष्टों की जड़ है अन्यथा जीव तो शाश्वत है। न तो वह कभी जन्मता है, न कभी मरता है। मूर्ख लोग इस समस्या को भूल जाते हैं। उन्हें इसका पता ही नहीं रहता कि जीवन की समस्याओं को किस तरह हल किया जाए। उल्टे वे क्षणिक पारिवारिक झंझटों में उलझे रहते हैं और उनकी समझ में यह नहीं आता कि शाश्वत समय, अदृश्य रूप से बीतता जा रहा है, उनकी सीमित आयु हर क्षण घटती जा रही है और जन्म-मृत्यु एवं रोग तथा बुढ़ापे के चक्कर की सबसे बड़ी समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। ही भ्रम कहलाता है।

किन्तु जो व्यक्ति भगवान् की भक्तिमय सेवा के प्रति जागरूक रहता है, उस पर यह भ्रम प्रभाव नहीं डाल सकता। युधिष्ठिर महाराज तथा उनके भाई पाण्डव सभी भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में लगे रहते थे और उन्हें इस भौतिक जगत के मायावी सुख के प्रति तनिक भी आकर्षण न था। जैसाकि हम पहले बता चुके हैं, महाराज युधिष्ठिर भगवान् मुकुन्द (मोक्षदाता भगवान्) की सेवा में अचल थे, अतएव उन्हें स्वर्ग में उपलब्ध जीवन के सुख का भी आकर्षण न था, क्योंकि ब्रह्मलोक तक में उपलब्ध सुख क्षणिक तथा भ्रामक होता है। चूँकि जीव शाश्वत है, अतएव वह भगवान् के नित्य धाम (परव्योम) में ही सुखी रह सकता है जहाँ से बारम्बार जन्म-मृत्यु, रोग तथा बुढ़ापे के इस भूभाग में कोई नहीं लौटता। अत: ऐसा कोई भी सुख या भौतिक सुविधा, जो शाश्वत जीवन प्रदान नहीं कर सकती, शाश्वत जीव के लिए भ्रम ही है। जो इस तथ्य को समझ लेता है, वह विद्वान है और ऐसा विद्वान व्यक्ति, ब्रह्मसुखम् के नाम से विख्यात वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी भौतिक सुख का बलिदान कर सकता है। इस सुख के लिए वास्तविक योगी तक लालायित रहते हैं और जिस तरह भूखा व्यक्ति, भोजन के बिना, अन्य समस्त सुख-सुविधाओं से सुखी नहीं बनाया जा सकता, उसी प्रकार जिसे आध्यात्मिक परम सुख की भूख है, उसे कितना ही भौतिक सुख क्यों न प्राप्त हो, किन्तु इसकी यह भूख बुझती नहीं। अतएव इस श्लोक में वर्णित उपदेश को महाराज युधिष्ठिर पर या उनके भाइयों तथा माता पर लागू नहीं किया जा सकता। यह धृतराष्ट्र जैसे व्यक्तियों के लिए है, जिन्हें शिक्षा देने के लिए विदुर विशेष रूप से आये।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥